Wednesday, August 31, 2011

एक जुझारू,प्रतिभावान और कर्तव्य परायण साथी -श्री रमापति राम

एक जुझारू,प्रतिभावान और कर्तव्य परायण साथी - श्री रमापति राम श्रीवास्तव एक अड़ियल अपने आदर्शों और सिद्धांतों के प्रति पूर्ण निष्ठावान, नियमों नीतियों तथा कार्यपद्धति में सजग एवं ज्ञान संपन्न एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपने स्वभाव के इन नैसर्गिक गुणों के कारण अपने उच्चाधिकारियों से सदैव तिरस्कार और अपमान झेला लेकिन इसके बावजूद बैंक के प्रति कार्य समर्पण में कभी कोई कमी नहीं आने दी । लखनऊ विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र सर्वाधिक अंक पाकर स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले इस प्रतिभावान व्यक्तित्व ने कभी भी अपनी योग्यता का ढिढोरा नहीं पीटा . वह चाहता था कि सर्वोत्तम अंक और प्रथम श्रेणी के साथ उसे रिसर्च करने का अवसर मिले .लेकिन आर्थिक अभावों ने उसकी इस चाहत को पूरा नहीं होने दिया । लखनऊ विश्वविद्यालय उसकी आर्थिक तंगी के चलते उसके अरमानों को पूरा करने के लिए कोई मदद दे पाने में असमर्थ था .अंततः रमापति ने भूमि विकास बैंक में सहायक आंकिक के पर नौकरी के लिए आवेदन किया । मेरिट अच्छी थी ही इसलिये चयन हो गया और मार्च १९७४ में रमापति भूमि विकास बैंक में सहायक आंकिक पद पर नियुक्त पा गए । नौकरी कि शुरुआत भूमि विकास बैंक की एक शाखा से हुआ । काम में तेज रमापति बैंक सेवाओं के लिए पूरी तरह उपयुक्त थे क्योंकि गणित रमापति का सबसे प्रिय विषय रहा था इसके साथ ही उनकी स्मरण शक्ति भी विलक्षण थी । नियमों की बेहतर जानकारी तथा नियमो और नीतियों की परिधि में काम करने के स्वाभाव के कारण पूरी शाखा का काम अकेले ही वह करने में सक्षम थे । प्रतिभा कहीं छिपती नहीं है । शीघ्र ही रमापति को कैश का काम सौंप दिया गया। यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि दूसरे कमर्शियल बैंकों से पृथक भूमि विकास बैंक में ये उल्लेखनीय है कि शाखा पर कैशिएर का काम शाखा के सबसे सीनिएर सहायक आंकिक को सौंपा जाता है .यहाँ कैशियर की कोई अलग पोस्ट नहीं होती । रमापति नौकरी में नए ज़रूर थे लेकिन योग्यता में उनसे अधिक योग्य शाखा पर कोई दूसरा कर्मी नहीं था इसलिये शाखा प्रबंधक ने ये बड़ी ज़िम्मेदारी रमापति को सौंप दी । किसे पता था कि ये ज़िम्मेदारी रमापति के जीवन में एक नया तूफ़ान ले आएगी । कुछ ही दिनों के बाद शाखा पर चोरों ने बैंक कि तिजोरी तोड़ कर सारा पैसा चुरा ले गए । यद्यपि इस चोरी में रमापति का कोई योगदान नहीं था लेकिन कानून और व्यवस्था के रहनुमाओं ने रमापति के सभी गुणों को दरकिनार कर चोरी के इल्जाम में उसे मुलजिम बना दिया । अपनी बेगुनाही के लिए रमापति लगातार चीखता रहा लेकिन कौन सुनता नक्कार खाने में तूती की आवाज़ ,और रमापति के जीवन में एक अप्रत्याशित संघर्षों का दौर शुरू हो गया । पुलिस में प्रतानना में उसके कान के परदे फट गए लेकिन वो उसे दोषी सिद्ध नहीं कर पाए। व्यवस्था के अन्याय ने रमापति को विपत्तियों के साथ जिन त्रासदियों का शिकार बनाया उसके लिए वो किस अदालत में फ़रियाद करता । इसके बाद रमापति की नियुक्ति प्रधान कार्यालय में हुयी । यहाँ बहुत कम समय में रमापति की प्रतिभा अधिकारीयों कोसमझ में आगई । रमापति अपनी प्रतिभा के साथ अपने रूखे व्यवहार के साथ बैंक में पूरी निष्ठां के साथ काम करते रहे । इस दौरान उनके चाहने वाले और उनके नापसंद करने वालों की संख्या लगभग बराबर ही थी । या यूँ कहें कि मजबूरी में चाहने वालों की ही सर्वाधिक संख्या थी । सच सुनना किसी को गवारा नहीं था इसलिये रमापति के कार्य की सराहना खुल कर कभी नही हो सकी । लेकिन रमापति को इन सब की चाहत या दुश्मनी से कोई वास्ता नही था । बस अपने काम और और काम को सही ढंग से अंजाम देना , ये रमापति की फितरत रही। किसी भी अधिकारी से नियमों और नीतियों से परे काम करने के लिए रमापति सदैव असहमत रहते । और गाहे बगाहे वो सीधे सीधे उन्हें नियमों के प्रति सजग रहने के लिए बताना नहीं भूलते । अगर कोई बात कर्मचारी हित में है और नियम उस हित साधन में बाधक है तो रमापति उस नियम संशोधन के लिए तो कहते लेकिन नियमों से परे कोई लाभ दिए जाने का पुर जोर विरोध करते । और यही स्थिति यदि किसी अधिकारी को नियमों से परे कोई लाभ दिए जाने के लिए उन पर दबाव डाला जाता तो वह विफर उठते और अपने हाथ से ऐसा कोई काम करने से साफ़ इनकार कर देते । अधिकारी वर्ग इसमें अपनी तौहीन महसूस करते लेकिन रमापति जी उनकी नाराज़गी से कभी डरे या सहमें नहीं । अपनी सेवा निवृत्ति के दिन तक रमापति अपनी सीट पर उसी निष्ठां से काम करते रहे । अपने ढंग के अनोखे व्यक्तित्व वाले रमापति के सेवा निवृत्ति से बैंक में एक युग का अंत मान रहे हैं उनके अधीनस्थ उनके साथीगन। उनकी प्रतिभा और योग्यता का कोई दूसरा कर्मी वर्तमान में इस संस्था में नहीं है -ये निर्विवाद है । इससे पहले भी हमारे बैंक में विलक्षण प्रतिभाएं रहीं हैं जिन्हें बैंक के साथियों को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए । नाम ज्यादा नहीं हैं - प्रतिभावान स्वर्गीय अजमुतुल्लाह साहेब, श्री नन्दलाल श्री ज़फर इकबाल और श्री आर एन मिश्र आदि। विदाई के दिन भी रमापति अपने उसी स्वभाव के साथ बोले यद्यपि आज भावुक थे । मैं इस प्रतिभावान अपने साथी को अपनी हार्दिक शुभकामनाओं के साथ श्रद्धा पूर्वक प्रणाम करता हूँ । रमापति आप अविस्मर्णीय हैं और अनुकरणीय हैं ।