Tuesday, February 5, 2013
Monday, June 4, 2012
' मैं उर्दू हूँ ' नाट्य प्रस्तुति के बारे में
' मैं उर्दू हूँ ' नाट्य प्रस्तुति के बारे में
मीर-ओ- ग़ालिब ने नाजों से पाला इसे ,दर्द और जोक ने भी सजाया इसे , दाग़ -ओ-चकबस्त ,हसरत का अरमान है,ये फिराक -ओ-जिगर की भी पहचान है ,ये मजाज-ओ- असर का हसीं साज़ है ,इससे छूटा न छूटेगा ये हिन्दोस्तां, ये है उर्दू ज़बां....उर्दू के जन्म उसके विकास और उसकी दुर्दशा को अपनी कल्पना शक्ति का आश्रय प्रदान कर एक रोचक वृत्त चित्र के रूप में प्रस्तुत करने की भावना को स्वरुप प्रदान करना कदाचित इतना सरल कार्य नहीं है किन्तु जैसे और जो बन पड़ा उसे आकर्षक बनाने के प्रयास में जो कुछ सामने आया उससे आम आदमी की सोच और उसके अन्तर्निहित चाहत का पता चलता है. जब नाटक कार उर्दू के जन्म की कहानी से तथ्यों को भावुकता के तार से एकबद्ध करने का प्रयास करता है तो ताकिक आधार से परे फिल्मी ढंग से उसे नाटक राजनैतिक आकांक्षाओं से अभिप्रेरित प्रस्तुति से अधिक कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता .टर्की के ओर्दु से लिए गए उर्दू का जन्म अनेक किवंदंतियों से घिरा है. लश्करी ज़बां ,ब्रिज भाषा और टर्की किंचित उर्दू के उद्भव के केंद्र माने जासकते हैं किन्तु हिंदुस्तान में मुस्लिम शाशन के दौरान इसमें फारसी और अरबी ने इस भाषा को और अधिक ताक़तवर बनाया .आम बोलचाल की भाषा के क्रमिक विकास में अनेक रोचक घटना क्रम हैं जिसे प्रस्तुति में छुआ तक नहीं गया ..खैर आलोचना के समय हम ये भूल जाते हैं कि ये कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं कि जिसे एक बार लिख दिया गया तो दुबारा उसे बेहतर नहीं बनाया जा सकता ..अच्छी प्रस्तुति के लिए ज़रूरी है कि उर्दू के विद्वानों को इस काम में शामिल किया जाता ..लेकिन अच्छा ये है कि एक विचार की कंकड़ी शांत तालाब में डाली गयी जिससे भावनाओं में कुछ उबाल पैदा हो . सोचिये ! क्या कोई भाषा अनायास एक दिन एक साल अथवा एक पीढी में अपना मुकाम बना सकती है? मेरे ख्याल से तो नहीं . भाषाए रातो रात पैदा नहीं होती , उनके निरंतर विकास और पनपने में सदियाँ लग जातीं हैं .इसी तरह उर्दू के व्याकरण के मानकीकरण जिससे उसका स्वरुप निर्धारित हुआ होगा ,में ५ लस ६ शताब्दिया लगा गयी होंगी.तदनुसार अनुमानतः १०वी शताब्ती के मध्य अथवा ११वी शताब्दी के शुरूआती दौर में उर्दू का उद्भव विद्वानों ने भी माना है. लेकिन शुरूआती दौर उर्दू के स्वरुप निर्धारण के उसके व्याकरण आदि के संजोये जाने का काल माना जासकता है उसके व्यावहारिक व्याकरण अथवा साहित्यिक उपलब्धियों का दौर तो कतई नहीं. और अपने उद्भव के शुरूआती दौर में इसका उपयोग भी मात्र संचार माध्यम की बोली के रूप में किया गया होगा .और तब इसे हिन्दवी अथवा दहलवी जैसा कि इसे देवनागरी में लिखा जाता है कहा गया . १४वी शताब्दी में इसे दक्षिण भारत में आगाज़ मिला . दक्षिण भारत से हमारा मतलब हैदराबाद से है . और यहाँ पर स्थानीय हिन्दवी का विस्तार हुआ अनेक स्थानीय भाषा के शब्द तथा मुहाविरे इसमें जुड़े.भाषा के इस नए संस्करण को लोगों ने दक्खिनी नाम दिया .शब्दावली और शब्द कोष का विस्तार होता गया और दक्खिनी रेख्ता में तब्दील हो गयी . और ऐसा माना जाता है कि ये रेख्ता ही आधुनिक उर्दू भाषा की अग्रदूत है. रेख्ता का मानकीकरण लगभग सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के दौरान शाहजहाँ और औरंगजेब के शाशन काल में हुआ जब उर्दू के क्रत्तिम स्वरुप ने पूर्ण स्वरुप तथा अधिकतम सामर्थ्य सामिग्री तथा शक्ति पाई .विश्व की दूसरी भाषाओँ की तरह ही उर्दू ने भी कविता अथवा शायरी के माध्यम से साहित्य की दुनिया में अपना क़दम रखा . फारसी और अरबी के उल्लेखनीय विद्वान अमीर खुसरो को उर्दू का पहला कवि माना जाता है. उन्होंने उस दौर में प्रचिलित हिन्दवी में अपनी कवितायेँ लिखीं. कली क़ुतुबशाह और वली दक्किनी इस भाषा के उस दौर के कवि कहे जाते हैं . इस युग के दूसरे प्रसिद्द कवि / शायर हैं-मीर तकी मीर ,मुशाफी ,मीर दर्द , कायम चंद पूरी,हैदर अली आतिश ]उस्ताद जोक ,मीर बाबर अनीस,मिर्ज़ा असद उल्लाह खान ग़ालिब .यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि उर्दू अपने पूर्ण अस्तित्व में सत्रहिवीं शताब्दी में ही आसकी जब इसे न्यायालयों में राज भाषा का दर्ज़ा मिला .१८वी शताब्दी में तो उर्दू साहित्य का और उसमे उर्दू शायरी का असाधारण विकास हुआ. यही वो वक़्त था जब उर्दू ने फारसी भाषा को जो उस वक़्त वहां की क्षेत्र की बोल चाल की भाषा थी , को चलन से बाहर कर दिया . अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर अपनी विशिष्ट शैली के उर्दू शायर थे. १९वी शताब्दी के महान शायरों में अल्लामा इकबाल ने इन्क़लाबी शायरी को जन्म दिया .सामाजिक न्याय तथा साम्यवादी विचारधारा से शायरी को एक नया अंदाज़ दिया फैज़ अहमद फैज़ ने. मुंशी प्रेमचंद ने उर्दू कहानी -सोज़-ए.वतन से एक नया मुकाम तलाशा और उसके बाद तो मोहम्मद हसन अस्करी ,सज्जाद ज़हीर ,राजिंदर सिंह बेदी,क्रिशन चंदर सआदत हसन मंटो इस्मत चुगताई मुमताज़ मुफ्फती,अहमद नदीम कासमी तथा अशफाक अहमद प्रमुख उर्दू कहानीकारों ने उर्दू को आम आदमी के बीच गहरी पैठ बनाई. उर्दू के उपन्यासों में सबसे पहले नाजिर अहमद जिन्होंने मिरत-उल - उरूस बनत-उन-नाश ,तौबत -उन नसूह आदि रोचक उपन्यास लिखे. उर्दू में साहित्य सर्जन का सिलसिला न कभी थमा था और न अभी तक थमा है .उर्दू साहित्य के साथ फिल्मों के दौर मैं भी उर्दू हमेशा आगे रही है मुग़ल-ए-आज़म, ताजमहल जैसी फिल्मे आज भी नयी पीढी में उतनी ही पसंद की जाती हैं जितनी उस दौर में जब इनका निर्माण किया गया था . उर्दू को इतना दीन हीन बना देना उर्दू के साथ बहुत बड़ी नाइंसाफी है. ये सिर्फ और सिर्फ दिमाग़ी फितूर है . नाट्य लेखन में असलियत को छिपाना आम आदमी को गुमराह करना है. झूठी सहनुभूति से राजनैतिक लाभ तो मिल सकता है लेकिन परिवर्तन के दौर से भला कौन बचा है . आज जो भी परिवर्तन हो रहा है उसमें किसी पर दोष मढ़ना बेमानी है .अतः इस नाट्य स्क्रिप्ट के कथानक प्रस्तुतीकरण पर कमोबेश लखनऊ के सभी समाचार पत्रों ने एक जैसी प्रतिक्रिया ज़ाहिर की है. इससे अधिक दुर्भाग्य पूर्ण और कुछ नहीं हो सकता जब समाज को खबरदार करने वाले नासमझी के भंवर में फसे हों .उर्दू नए और पुराने ज़माने की अनेक प्रचिलित भाषाओँ का संचयन है या यूँ कहें कि उर्द्दु व्याकरण में सभी भाषाओँ को समाहित करने की अनोखी सामर्थ्य है जो उसे अपेक्षाकृत उदारवादी भाषा बनाती है न कि केवल राजकीय संरक्षण पाने की मोहताज़ .उदारवादी वैशीकृत परिवेश में हम संकीर्णता के साथ किसी का पोषण नहीं कार सकते .जो श्रेष्ठ है उसकी श्रेष्ठता किसी व्यवस्था की उदासीनता अथवा निष्क्रियता से समाप्त नहीं हो सकती.वक़्त लगता है उसे सर्वग्राह्य होने में . आशावादी नजरिया हमें हमारे वजूद से हरदम जोड़े रहेगा. थोडा विचार करें नकारात्मक सोच से आम आदमी की सोच पर भावुकता से प्रहार करने वाले .
.
Wednesday, August 31, 2011
एक जुझारू,प्रतिभावान और कर्तव्य परायण साथी -श्री रमापति राम
एक जुझारू,प्रतिभावान और कर्तव्य परायण साथी - श्री रमापति राम श्रीवास्तव एक अड़ियल अपने आदर्शों और सिद्धांतों के प्रति पूर्ण निष्ठावान, नियमों नीतियों तथा कार्यपद्धति में सजग एवं ज्ञान संपन्न एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपने स्वभाव के इन नैसर्गिक गुणों के कारण अपने उच्चाधिकारियों से सदैव तिरस्कार और अपमान झेला लेकिन इसके बावजूद बैंक के प्रति कार्य समर्पण में कभी कोई कमी नहीं आने दी । लखनऊ विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र सर्वाधिक अंक पाकर स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले इस प्रतिभावान व्यक्तित्व ने कभी भी अपनी योग्यता का ढिढोरा नहीं पीटा . वह चाहता था कि सर्वोत्तम अंक और प्रथम श्रेणी के साथ उसे रिसर्च करने का अवसर मिले .लेकिन आर्थिक अभावों ने उसकी इस चाहत को पूरा नहीं होने दिया । लखनऊ विश्वविद्यालय उसकी आर्थिक तंगी के चलते उसके अरमानों को पूरा करने के लिए कोई मदद दे पाने में असमर्थ था .अंततः रमापति ने भूमि विकास बैंक में सहायक आंकिक के पर नौकरी के लिए आवेदन किया । मेरिट अच्छी थी ही इसलिये चयन हो गया और मार्च १९७४ में रमापति भूमि विकास बैंक में सहायक आंकिक पद पर नियुक्त पा गए । नौकरी कि शुरुआत भूमि विकास बैंक की एक शाखा से हुआ । काम में तेज रमापति बैंक सेवाओं के लिए पूरी तरह उपयुक्त थे क्योंकि गणित रमापति का सबसे प्रिय विषय रहा था इसके साथ ही उनकी स्मरण शक्ति भी विलक्षण थी । नियमों की बेहतर जानकारी तथा नियमो और नीतियों की परिधि में काम करने के स्वाभाव के कारण पूरी शाखा का काम अकेले ही वह करने में सक्षम थे । प्रतिभा कहीं छिपती नहीं है । शीघ्र ही रमापति को कैश का काम सौंप दिया गया। यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि दूसरे कमर्शियल बैंकों से पृथक भूमि विकास बैंक में ये उल्लेखनीय है कि शाखा पर कैशिएर का काम शाखा के सबसे सीनिएर सहायक आंकिक को सौंपा जाता है .यहाँ कैशियर की कोई अलग पोस्ट नहीं होती । रमापति नौकरी में नए ज़रूर थे लेकिन योग्यता में उनसे अधिक योग्य शाखा पर कोई दूसरा कर्मी नहीं था इसलिये शाखा प्रबंधक ने ये बड़ी ज़िम्मेदारी रमापति को सौंप दी । किसे पता था कि ये ज़िम्मेदारी रमापति के जीवन में एक नया तूफ़ान ले आएगी । कुछ ही दिनों के बाद शाखा पर चोरों ने बैंक कि तिजोरी तोड़ कर सारा पैसा चुरा ले गए । यद्यपि इस चोरी में रमापति का कोई योगदान नहीं था लेकिन कानून और व्यवस्था के रहनुमाओं ने रमापति के सभी गुणों को दरकिनार कर चोरी के इल्जाम में उसे मुलजिम बना दिया । अपनी बेगुनाही के लिए रमापति लगातार चीखता रहा लेकिन कौन सुनता नक्कार खाने में तूती की आवाज़ ,और रमापति के जीवन में एक अप्रत्याशित संघर्षों का दौर शुरू हो गया । पुलिस में प्रतानना में उसके कान के परदे फट गए लेकिन वो उसे दोषी सिद्ध नहीं कर पाए। व्यवस्था के अन्याय ने रमापति को विपत्तियों के साथ जिन त्रासदियों का शिकार बनाया उसके लिए वो किस अदालत में फ़रियाद करता । इसके बाद रमापति की नियुक्ति प्रधान कार्यालय में हुयी । यहाँ बहुत कम समय में रमापति की प्रतिभा अधिकारीयों कोसमझ में आगई । रमापति अपनी प्रतिभा के साथ अपने रूखे व्यवहार के साथ बैंक में पूरी निष्ठां के साथ काम करते रहे । इस दौरान उनके चाहने वाले और उनके नापसंद करने वालों की संख्या लगभग बराबर ही थी । या यूँ कहें कि मजबूरी में चाहने वालों की ही सर्वाधिक संख्या थी । सच सुनना किसी को गवारा नहीं था इसलिये रमापति के कार्य की सराहना खुल कर कभी नही हो सकी । लेकिन रमापति को इन सब की चाहत या दुश्मनी से कोई वास्ता नही था । बस अपने काम और और काम को सही ढंग से अंजाम देना , ये रमापति की फितरत रही। किसी भी अधिकारी से नियमों और नीतियों से परे काम करने के लिए रमापति सदैव असहमत रहते । और गाहे बगाहे वो सीधे सीधे उन्हें नियमों के प्रति सजग रहने के लिए बताना नहीं भूलते । अगर कोई बात कर्मचारी हित में है और नियम उस हित साधन में बाधक है तो रमापति उस नियम संशोधन के लिए तो कहते लेकिन नियमों से परे कोई लाभ दिए जाने का पुर जोर विरोध करते । और यही स्थिति यदि किसी अधिकारी को नियमों से परे कोई लाभ दिए जाने के लिए उन पर दबाव डाला जाता तो वह विफर उठते और अपने हाथ से ऐसा कोई काम करने से साफ़ इनकार कर देते । अधिकारी वर्ग इसमें अपनी तौहीन महसूस करते लेकिन रमापति जी उनकी नाराज़गी से कभी डरे या सहमें नहीं । अपनी सेवा निवृत्ति के दिन तक रमापति अपनी सीट पर उसी निष्ठां से काम करते रहे । अपने ढंग के अनोखे व्यक्तित्व वाले रमापति के सेवा निवृत्ति से बैंक में एक युग का अंत मान रहे हैं उनके अधीनस्थ उनके साथीगन। उनकी प्रतिभा और योग्यता का कोई दूसरा कर्मी वर्तमान में इस संस्था में नहीं है -ये निर्विवाद है । इससे पहले भी हमारे बैंक में विलक्षण प्रतिभाएं रहीं हैं जिन्हें बैंक के साथियों को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए । नाम ज्यादा नहीं हैं - प्रतिभावान स्वर्गीय अजमुतुल्लाह साहेब, श्री नन्दलाल श्री ज़फर इकबाल और श्री आर एन मिश्र आदि। विदाई के दिन भी रमापति अपने उसी स्वभाव के साथ बोले यद्यपि आज भावुक थे । मैं इस प्रतिभावान अपने साथी को अपनी हार्दिक शुभकामनाओं के साथ श्रद्धा पूर्वक प्रणाम करता हूँ । रमापति आप अविस्मर्णीय हैं और अनुकरणीय हैं । Tuesday, August 24, 2010
Monday, June 21, 2010
मेरे जन्म दिन का अर्थ !
२२ जून २०१० जिसने एक ऐतिहासिक सच कि कल्पना की कि आज दो-दो सूरज धरती पर दिखाई देंगे। २१ जून का दिन तो भागोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है ही कि वो वर्ष का सबसे बड़ा दिन होता है लेकिन २२ जून इसलिये महत्वपूर्ण माना जायेगा कि आज दुनिया को दो- सूर्य दिखाई देंगे। मगर केवल उन्हें जो सूर्य कि लालिमा के चहेते हैं जिन्हें प्रकृति में सर्वश्व दिखाई देता है। मैं भी खुद को बड़ा भाग्यवान समझता था कि भागीरथ के पुण्य से गंगा के प्रथ्वी पर अवतरण कि शुभ बेला में मेरा जन्म हुआ सबसे बड़ा दिन कहा गया उसे लेकिन इस महान तिथि को जन्म लेने मात्र से कोई कैसे महान हो जायेगा ये बात अब मेरी समझ में कुछ- कुछ आने लगी और मैं अपनी इस जन्म तिथि से थोडा डरने लगा । प्रकृति में परवर्तन को उजागर करने वाले इस बड़े दिन पर जन्म लेने वाले भी इस दिन की तरह महान होंगे ये कैसे संभव हो सकता है। आज के दिन अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाने तथा लोक कल्याण के लिए भागीरथ के तप के परिणामस्वरुप शश्य श्यामला धरती को हरियाली देने का पुण्य तो हमें नहीं मिल सकता .घर में हमारे एक चाचा जी जो विगत छह माह से लकवे से ग्रस्त अपाहिज बने पड़े हैं ,ज़िन्दगी के नाम पर थोड़ी सी चेतना और बिस्तर पर जन्मे घावों की मर्मान्तक पीड़ा से कराहते कराहते बेजान होते अपनी बेचारगी और उस करुनामय की निष्ठुरता का अंतहीन सा संघर्ष - क्या इस भागीरथ के ऐतिहासिक दिन पर कोई चमत्कार कर उन्हें पीड़ा मुक्त करा सका ? क्या बेरोजगारी की मार झेलते लगातार प्राइवेट कंपनी में छोटी पगार से अच्छी पगार की उम्मीद लगाए अपने मामा की तरफ कुछ मदद चाहने वाले अपने भांजे के लिए कोई सहारा बन सका ? पड़ोस में रहने वाले अपने मित्र की विधवा के प्लाट पर ज़बरन कब्ज़ा करने वाले असामाजिक तत्वों से मुकाबला कर उनका प्लाट उन्हें दिला सके? अपने मित्रो के बेटे जो अच्छी नौकरी के लिए डिग्रियों का ढेर इकठा कर रहे हैं उन्हें कोई कायदे की सलाह देकर उनके दुःख दूर कर सके ? अपने ही बैंक में कोई ऐसा काम जिससे बैंक की तरक्की होती मैंने किया ? दुखों के सागर में डूबते उतराते हमारे आस-पास जिन्हें हम सहारा दे सकते थे क्या उन्हें मैंने कुछ दिया? इन सब का उत्तर केवल और केवल 'न' है। तब इस बड़े दिन पैदा होने का क्या अर्थ है? हाँ संत कबीर के इस बात को स्वीकारने की सामर्थ्य ज़रूर मिली है - '' बुरा जो देखन मैं चल्या बुरा न मिल्या कोय , जो मन खोजा आपनो तो मुझ सा बुरा न कोय .''
Sunday, June 13, 2010
Sunday, May 23, 2010
सप्त- स्वर की भाव भूमिका --पचास वर्षों का सफ़र

सप्त-स्वर द्वारा भारत नाट्यम शास्त्रीय नृत्य परंपरा के कानपूर में पचास वर्ष के उपलक्ष्य में नृत्य एवं संगीत का दो दिवसीय आयोजन दिनांक २७ व् २८ मई को कानपूर के मोतीझील स्थित लाजपत भवन प्रेक्षागार में किया गया है। कार्य क्रम का पहला दिन " निवेद्यतम सौरभीयम " अर्थात दक्षिण भारतीय शाश्त्रीय नृत्य - भरत नाट्यम के कानपूर में प्रतिस्थापक गुरु श्री युत श्री धरन नायर को श्रद्धा सुमन समर्पित करते हुए, उनकी परंपरा का मनोहारी नैवेद्य कानपूर के दर्शकों को वितरित करना। इस कार्य क्रम में निष्ठा शर्मा एवं उनकी शिष्याएं भरत नाट्यम की बहु रंगी कलाओं के साथ अलग अलग एवं समूह में नृत्य प्रस्तुत करेंगी ।
यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि निष्ठा शर्मा गुरु श्रीयुत श्री धरन नायर की शिष्या हैं । वर्ष १९५१ में श्री धरन जी कानपूर में आये, वर्ष 1956 में कुछ लोगों ने उनसे भरत नाट्यम का प्रशिक्षण भी लिया किन्तु एक संस्थागत नियमित भरत नाट्यम का प्रशिक्षण कार्यक्रम उनके द्वारा १९६० से प्रारंभ किया गया जो अनवरत अभी तक सुव्यवस्थित ढंग से चलाया जारहा है। पहले नृत्य प्रशिक्षण स्वयं गुरु जी (श्री धरन नायर ) द्वारा ही दिया जाता था। लेकिन उनके कानपूर से लखनऊ प्रस्थान करने के उपरान्त ये कार्य उनकी सुयोग्य शिष्या निष्ठा द्वारा पूरे समर्पण के साथ किया जा रहा है। निष्ठा ने गुरु श्रीयुत श्री धरन नायर के सानिध्य में भारत नाट्यम की बारीकियों तथा गति मुद्रा आदि का सफल प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने गुरु का आशीर्वाद प्राप्त किया गुरु श्रीधरन नायर ने उन्हें कानपूर में नृत्य प्रशिक्षण के हेतु अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए इस कार्य को निरंतर चलाये रखने के लिए परम्परा कमान सौंप दी । निष्ठा बहुमुखी प्रतिभा कि धनी हैं । भरत नाट्यम में अलंकार की उपाधि अर्जित करने के पश्चात उन्होंने संगीत (गायन) में परास्नातक कि उपाधि ली तदनंतर विश्ववद्यालय प्रवक्ता हेतु निर्धारित नेट में भी सफलता प्राप्त की निष्ठा ने संगीत में पी एच.डी हेतु अपनी थीसिस विश्ववद्यालय में प्रस्तुत कर दी है। नृत्य एवं संगीत के साथ कानपूर के रंगमंच पर भी अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है । उत्तर भारत कि सुविख्यात नाट्य संस्था दर्पण के सभी संगीतमय नाट्य प्रस्तुतियों में कोरिओग्राफी एवं नृत्य निर्देशन निष्ठा द्वारा ही किया गया है। निष्ठा एक संवेदन शील अभिनेत्री, नृत्य निर्देशिका, गायिका, नृत्य एवं गायन प्रशिक्षिका के साथ साथ कानपूर के सांस्कृतिक समूह की विशिष्ट एवं समर्पित कार्य कर्त्री हैं । २७ मई का होने वाला नृत्य आयोजन एवं उनके निर्देशन में नृत्य प्रस्तुतीकरण कानपूर के नगर वासियों के लिए विशेष आकर्षण होगा।
दिनांक २८ मई २०१० को सुविख्यात गायिका और कवियत्री सीमा अनिल सहगल का संगीतमय कार्यक्रम होगा । कदाचित सीमा सहगल कानपूर में पहली बार आ रही हैं । लेकिन उनकी गायकी लाजवाब है। वे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति कि गायिका हैं। उनकी एल्बम सरहद बहुत ही लोकप्रिय एल्बमों में से है। उन्हें पीस सिंगर आफ इंडिया, कश्मीर कि कोकिला आदि विशेषणों से नवाज़ा जा चूका है। दिनांक २८ मई २०१० को सीमा सहगल की गायकी से सजी संवरी ग़ज़ल संध्या निश्चय ही एक अविस्मरनीय शाम होगी। साम्प्रदायिक सौह्राद के लिए गीतों कोप्रस्तुत करने कि सीमा सहगल कि ख्याति कानपुर में कितना सद्भाव जनमानस तक पंहुचा पाएंगी ये ये उनके कार्य क्रम कि कानपूर वासियों कि सहज प्रतिक्रिया स्वतः बता देगी। आप अगर इस ब्लॉग को पढ़ें तो दिनांक २७ व् २८ मई को शाम ७-३० बजे से नृत्य और ग़ज़ल गायकी से सजी लाजपत भवन मोतीझील में आयोजित संध्या में अवश्य आयें।
Subscribe to:
Comments (Atom)










