Monday, June 4, 2012

' मैं उर्दू हूँ ' नाट्य प्रस्तुति के बारे में





' मैं उर्दू हूँ ' नाट्य प्रस्तुति के बारे में
                          मीर-ओ- ग़ालिब ने नाजों से पाला इसे ,दर्द और जोक ने भी सजाया इसे , दाग़ -ओ-चकबस्त ,हसरत का अरमान है,ये फिराक -ओ-जिगर की भी पहचान है ,ये मजाज-ओ- असर का हसीं साज़ है ,इससे छूटा न छूटेगा ये हिन्दोस्तां, ये है उर्दू ज़बां....उर्दू के जन्म उसके विकास और उसकी दुर्दशा को अपनी कल्पना शक्ति का आश्रय प्रदान कर एक रोचक वृत्त चित्र के रूप में प्रस्तुत करने की भावना को स्वरुप प्रदान करना कदाचित इतना सरल कार्य नहीं  है किन्तु जैसे और जो बन पड़ा उसे आकर्षक बनाने के प्रयास में जो कुछ सामने आया उससे आम आदमी की सोच और उसके अन्तर्निहित चाहत का पता चलता है. जब नाटक कार उर्दू के जन्म की कहानी से तथ्यों को भावुकता के तार से एकबद्ध करने का प्रयास करता है तो ताकिक आधार से परे फिल्मी ढंग से उसे नाटक राजनैतिक आकांक्षाओं से अभिप्रेरित प्रस्तुति से अधिक कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता .टर्की  के ओर्दु से लिए गए उर्दू का जन्म अनेक किवंदंतियों से घिरा है. लश्करी ज़बां ,ब्रिज भाषा और टर्की  किंचित उर्दू के उद्भव के केंद्र माने जासकते हैं किन्तु हिंदुस्तान में मुस्लिम शाशन के दौरान इसमें फारसी और अरबी ने इस भाषा को और अधिक ताक़तवर  बनाया .आम बोलचाल की भाषा के क्रमिक विकास में अनेक रोचक घटना क्रम हैं जिसे प्रस्तुति में छुआ तक नहीं गया ..खैर आलोचना के समय हम ये भूल जाते हैं कि ये कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़   नहीं कि जिसे एक बार लिख दिया गया तो दुबारा उसे बेहतर नहीं बनाया जा सकता ..अच्छी प्रस्तुति के लिए ज़रूरी है कि उर्दू के विद्वानों को इस काम में शामिल किया जाता ..लेकिन अच्छा ये है कि एक विचार की कंकड़ी शांत तालाब में डाली गयी जिससे भावनाओं  में कुछ उबाल पैदा हो .  सोचिये ! क्या कोई भाषा अनायास एक दिन एक साल अथवा एक पीढी में अपना मुकाम बना सकती है? मेरे ख्याल से तो नहीं . भाषाए रातो रात पैदा नहीं होती , उनके निरंतर विकास और पनपने में सदियाँ लग जातीं हैं .इसी तरह उर्दू के व्याकरण के मानकीकरण जिससे उसका स्वरुप निर्धारित हुआ होगा ,में ५ लस ६ शताब्दिया लगा गयी होंगी.तदनुसार अनुमानतः १०वी  शताब्ती के मध्य अथवा ११वी  शताब्दी के शुरूआती दौर में उर्दू का उद्भव विद्वानों ने भी माना है. लेकिन शुरूआती दौर उर्दू के स्वरुप निर्धारण के उसके व्याकरण आदि के संजोये जाने का काल माना जासकता है उसके व्यावहारिक व्याकरण अथवा साहित्यिक उपलब्धियों का दौर तो कतई नहीं. और अपने उद्भव के शुरूआती दौर में इसका उपयोग भी मात्र संचार माध्यम की बोली के रूप में किया गया होगा .और तब इसे हिन्दवी अथवा दहलवी जैसा कि इसे देवनागरी में लिखा जाता है कहा गया . १४वी  शताब्दी  में इसे दक्षिण भारत में आगाज़ मिला . दक्षिण  भारत से हमारा मतलब हैदराबाद से है . और यहाँ पर स्थानीय हिन्दवी का विस्तार हुआ अनेक स्थानीय भाषा के शब्द तथा मुहाविरे इसमें जुड़े.भाषा  के इस नए संस्करण को लोगों ने दक्खिनी नाम दिया .शब्दावली और शब्द कोष का विस्तार होता गया और दक्खिनी रेख्ता में  तब्दील हो गयी . और ऐसा माना जाता है कि  ये रेख्ता ही आधुनिक उर्दू भाषा की अग्रदूत है. रेख्ता का मानकीकरण लगभग सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के दौरान शाहजहाँ और औरंगजेब के शाशन काल में हुआ जब उर्दू के क्रत्तिम स्वरुप ने पूर्ण स्वरुप तथा अधिकतम सामर्थ्य सामिग्री तथा शक्ति पाई .विश्व की दूसरी भाषाओँ की तरह ही उर्दू  ने भी कविता अथवा शायरी के माध्यम से साहित्य की दुनिया  में अपना क़दम रखा . फारसी और अरबी के  उल्लेखनीय विद्वान अमीर खुसरो को उर्दू का पहला कवि माना जाता है. उन्होंने उस दौर में प्रचिलित हिन्दवी में अपनी कवितायेँ लिखीं. कली क़ुतुबशाह और वली दक्किनी  इस भाषा के उस दौर के  कवि कहे जाते हैं . इस युग के दूसरे प्रसिद्द कवि / शायर हैं-मीर तकी मीर ,मुशाफी ,मीर दर्द , कायम  चंद पूरी,हैदर अली आतिश ]उस्ताद जोक ,मीर बाबर अनीस,मिर्ज़ा असद उल्लाह खान ग़ालिब .यहाँ ये बताना  ज़रूरी है कि उर्दू  अपने पूर्ण अस्तित्व में सत्रहिवीं शताब्दी में ही आसकी जब इसे न्यायालयों में राज भाषा का दर्ज़ा मिला .१८वी शताब्दी में तो उर्दू  साहित्य का और उसमे उर्दू शायरी का   असाधारण विकास हुआ. यही वो वक़्त था जब उर्दू ने फारसी भाषा को जो उस वक़्त  वहां की   क्षेत्र की बोल चाल  की भाषा थी , को चलन से बाहर कर दिया . अंतिम मुग़ल बादशाह  बहादुर शाह ज़फर अपनी विशिष्ट शैली के उर्दू शायर थे. १९वी शताब्दी के महान शायरों में अल्लामा इकबाल ने इन्क़लाबी शायरी को जन्म दिया .सामाजिक न्याय तथा साम्यवादी विचारधारा से शायरी को एक नया अंदाज़ दिया फैज़ अहमद फैज़ ने. मुंशी प्रेमचंद ने उर्दू कहानी -सोज़-ए.वतन से एक नया मुकाम तलाशा और उसके बाद तो मोहम्मद हसन अस्करी ,सज्जाद ज़हीर ,राजिंदर सिंह बेदी,क्रिशन चंदर सआदत हसन मंटो इस्मत चुगताई मुमताज़ मुफ्फती,अहमद नदीम कासमी तथा अशफाक अहमद  प्रमुख उर्दू कहानीकारों ने उर्दू को आम आदमी के बीच गहरी पैठ बनाई. उर्दू के उपन्यासों में सबसे पहले नाजिर अहमद जिन्होंने मिरत-उल - उरूस बनत-उन-नाश ,तौबत -उन नसूह आदि रोचक उपन्यास लिखे. उर्दू में साहित्य सर्जन का सिलसिला न कभी थमा था और न अभी तक थमा है .उर्दू साहित्य के साथ फिल्मों के दौर मैं भी उर्दू हमेशा आगे रही है मुग़ल-ए-आज़म, ताजमहल जैसी फिल्मे आज भी नयी पीढी में उतनी ही पसंद की जाती हैं जितनी उस दौर में जब इनका निर्माण किया गया था . उर्दू को इतना दीन हीन बना  देना उर्दू के साथ बहुत बड़ी नाइंसाफी है. ये सिर्फ और सिर्फ दिमाग़ी फितूर है . नाट्य लेखन में असलियत को छिपाना आम आदमी को गुमराह करना है. झूठी सहनुभूति से राजनैतिक लाभ तो मिल सकता है लेकिन  परिवर्तन के दौर से भला कौन बचा है . आज जो भी परिवर्तन हो रहा है उसमें किसी पर दोष मढ़ना बेमानी है .अतः इस नाट्य स्क्रिप्ट के कथानक प्रस्तुतीकरण पर कमोबेश लखनऊ के सभी समाचार पत्रों ने एक जैसी प्रतिक्रिया ज़ाहिर की है. इससे अधिक दुर्भाग्य पूर्ण और कुछ नहीं हो सकता जब समाज को खबरदार करने वाले नासमझी के भंवर में फसे हों .उर्दू नए और पुराने ज़माने की अनेक प्रचिलित भाषाओँ का संचयन है  या यूँ  कहें कि उर्द्दु व्याकरण में सभी भाषाओँ को समाहित करने की अनोखी सामर्थ्य है  जो उसे अपेक्षाकृत उदारवादी भाषा बनाती है न कि केवल राजकीय संरक्षण पाने की मोहताज़ .उदारवादी वैशीकृत परिवेश में हम संकीर्णता के साथ किसी का पोषण नहीं कार सकते .जो श्रेष्ठ है उसकी श्रेष्ठता किसी व्यवस्था की उदासीनता अथवा निष्क्रियता से समाप्त नहीं हो सकती.वक़्त लगता है उसे सर्वग्राह्य होने में . आशावादी नजरिया हमें हमारे वजूद से हरदम जोड़े रहेगा. थोडा विचार  करें नकारात्मक सोच से आम आदमी की सोच पर भावुकता से प्रहार करने वाले .
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