Saturday, March 13, 2010

पर्दा नहीं जब कोई खुदा से बन्दों से पर्दा करना क्या !




मोहब्बत करने वालों के लिए तो हर दिन वलेनटीन डे है। ऐसे में किसी को क्या पडी है जो दो मोहब्बत करने वालों को रोके । लेकिन देखने वालो का दिल है इन प्रेमियों को देख कर मचल उठता है। और कुछ तो कर नहीं सकते इसलिये जलन से ही काम चला लेते हैं । ऐसा मैं अक्सर सोचा करता था .लेकिन आज तो लगता है मैं भी उसी कतार में खड़ा हो गया हूँ। बार बार वही दृश्य नज़र के सामने आजाता और मजबूर होकर मैं अपना बवाल इस ब्लॉग के मत्थे डाल रहा हूँ । ११ मार्च को हमारे बैंक के मुख्य महा प्रबंधक की वयोवृद्ध माता जी का स्वर्गवास हो गया । मुझे मालुम हुआ तो मैं भी श्री आर.के.सिंह और श्री ऐ.के-प्रधान के साथ भैंसा कुंद जा पहुंचा। लेकिन हमारे पहुचने का कोई अर्थ नहीं था संस्कार करने वाले परिजन तथा हमारे सी.जी-एम् साहेब वापस जा चुके थे .ए.जी .एम् साहेब श्री आर.के .सिंह ने सुझाव दिया की बैंक के प्रदर्शनी हाल में डाक्टर लोहिया के छाया चित्र के साथ उनके सिद्धांतों को दर्शाता कोई अच्छा महावाक्य पास में ही लोहिया गार्डेन से नोटकर लिया जाय । मुझे इस विचार के पालन में कोई दिक्कत नहीं थी अतः हम तीनों तुरंत लोहिया पार्क जा पहुंचे .लोहिया पार्क में प्रवेश हेतु पांच रुपये का एक व्यक्ति का टिकट लेना ज़रूरी है जिसे श्री प्रधान साहेब ने हम लोगों के अपने वाहन जमा करने के दौरान खरीद लिए और हम लोग लोहिया गार्डेन में अन्दर जा पहुंचे। लोहिया जी के महावाक्य के शिला लेख तो आस पास नहीं दिखे हाँ चारों तरफ प्रेमी युगल लेते बैठे टहलते , कुछ प्राक क्रीडा में मग्न , कुछ अठखेलियाँ करते चाह्चाते आपस में चुहल बाज़ी करते दिखाई पड़े। लोहिया पार्क का नज़ारा प्रमियों के रोमांस से सरबोर था और हम निगाह नीचे किये हुए भी किसी न किसी प्रेमी युगल के निकट से गुजरने के लिए मजबूर थे । हमें संकोच था की हमारे देखने और उपस्थिति से कहीं उन्हें व्यवधान न हो लेकिन वो इतने उतावले की सब कुछ कर दिखाने को लालायित । बहुत अन्दर जाने पर हमें एक शिला लेख दिखा .शिला लेख में अंकित " ऐ भारत माता ! हमें शिव का मस्तिष्क दो, कृष्ण का हृदय दो तथा राम का कर्म और वचन दो ।" हमें प्रेरणा दाई प्रतीत हुआ तो उसे नोट करने के लिए एक अदद पेन तथा एक कोरे कागज़ की दरकार थी .तभी देखा उसी शिला की धोक लगाए मन वचन कर्म से समर्पित एक युगल को प्रेमालाप करते देखा तो हम सब थोडा ठिठके । थोडा पीछे हटने का उपक्रम किया तो युगल ने हमें दिखाते हुए अपने प्रेमालाप की प्रगाढ़ता को और अधिक दर्शनीय बनाने के साथ गर्वोंमुक्त मुस्कान के साथ अहसास दिलाया मुझे तुम्हारी उपस्थिति की परवाह नहीं .मेरा साहस में इजाफा हुआ । मैं थोडा आगे बढ़ कर उनके पास गया लेकिन वो अपनी मस्ती में एक दूसरे को आगोश में भरे तल्लीन रहे । मैं हेल्लो कहते हुए उनसे मुखातिब हुआ तो लड़की ने अपने अंदाज़ के साथ जवाब दिया ये..एस..! मैंने विनम्रता और क्षमा याचना करते हुए कागज़ और कलम की मांग की तो उसने धीरे से बगल में पड़े अपने पर्स को अपनी उसी मुद्रा में पड़े तहते हुए उठाया और अपनी पूरी नोट बुक हमें पकड़ा दी । मैं लोहिया जी का महावाक्य मांगी गयी नोट बुक में लिख रहा था " मैं चाहता हूँ लोग एक जीवन मान प्राप्त करें लेकिन ऐसा न हो की जीवनइस्तर के लिए कालीन और कुर्सियों के गुलाम बन जाएँ ।" जो समूह और जातीय तिरस्कृत हैं उन्हें विशेष रूप से और सहारा देकर उठाना होगा । " प्रेम प्राकट्य की वर्जनाहीनता " ऊपर उठने से पहले नीचे की ओर जाने का सुगम रास्ता प्रतीत हुआ लेकिन उन्हें नहीं मुझ जैसे मूढ़ लोगों को जो उनकी दीवानगी को अपने नज़रिए से तौलरहे थे । मैं जहाँ इन द्रश्यों को नित्य-प्रति होने वाली बलात्कार घटनाओं से जोड़ रहा था वहीँ लोहिया पार्क में तल्लीन युगल खुद को बेपरवाह और साहस की मिसाल के रूप में दुनिया को चुनौती डे रहे थे-और ये अहसास करा रहे थे की प्यार किया तो डरना क्या,---

1 comment:

Ankit said...

आपने एक बहुत अच्छा लेख लिखा है, जब मैं लखनऊ में था तो मेरी इच्छा हुई की चलिए एक दिन लोहिया पार्क घुमा जाए मगर अपने दोस्त से मालूम चला की लोहिया पार्क में जाके आप ऐसे नज़ारे ही देख सकते हैं और कुछ नहीं.