प्रार्थना में ....
विगत के अज्ञात कर्मों की झलक इस भाँति उभरी,
जिस तरह से,शांत जल में डाल दे कोई कंकडी।
एक कोलाहल था कि जिसमे थी तरंगित यातना,
याकि मन स्वछन्द विगलित कर्म की थी वासना।
भाव द्रष्टाका न मन में ,
प्रार्थना निर्भाव पल में,
मैं अकिंचन,व्यर्थ चिंतन,
अब ना था ये भाव अर्चन।
मूढ़ता के मध्य खुद पर खीजता,
शांत होने का न पथ भी सूझता ।
आह! मन संताप ,कैसे करू पश्चाताप!
क्या प्रभु अज्ञानता भी है हमारा पाप!
क्यां करू मैं माँ तुझे कुछ वो समर्पण दे न पाया,
मूढ़ता अविवेक कलुषित दुर्गुणों की पड़ी छाया।
और पिता सर्वस्व पालक भी रहे वंचित,
कर ना पाया मैं कभी कुछ श्रेष्ठ गुण अर्जित।
प्रार्थना में नाथ जब तुमको कहा ' पितु मात
'पितु मात की आवृत्ति से तत्क्षण लगा आघात।
मैं तो रहा हूँ सर्वथा उस भाव से अनजान,
जिसको सुना करता था कि माता पिता भगवान।
ये हमारी वेदना प्रभु ध्यान में जो मुखर होती,
भूत कि अनुभूति प्रायः ध्यान में ही प्रखर होती।
और अब मैं लड़ रहा हूँ - स्वयं से,
इस आघात से और अंतर्द्वंद से ;
क्या करू अब कहाँ जाऊँ किससे कहूँ ,
या लिए संताप मैं खुद से सदा लड़ता रहूँ?
है नहीं मुझमे निराशा इसलिए तो लड़ रहा हूँ,
है तेरी सामर्थ्य फिर क्यों मैं अकेला पड रहा हूँ
माता पिता की ये कमी ही अब मुझे भरमा रही है ,
कर नहीं पाया! के अंतर्द्वंद में ही आयु बीती जा रही है।
हे मेरे प्रभु ! तुम हो दयालू ,तुम पर मेरी है आस,
कठिन पथ है चल रहा लेकर तेरा विश्वास!
बस यही विश्वास ... एक ही विश्वास.. मेरी प्रार्थना में .
1 comment:
आज आपका ब्लॉग देखा बहुत अच्छा लगा.... मेरी कामना है कि आपके शब्दों में नयी ऊर्जा, व्यापक अर्थ और असीम संप्रेषण की संभावनाएं फलीभूत हों जिससे वे जन-सरोकारों की अभिव्यक्ति का समर्थ माध्यम बन सकें....
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सादर-
आनंदकृष्ण, जबलपुर.
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