Monday, August 31, 2009

Mrityu Prasang

मृत्यु प्रसंग
आज हमारे ऑफिस में एक सहयोगी ( चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी) की अचानक मृत्यु हो गयी.मैं जब ऑफिस पहुँचा रोज़ से थोड़ा अलग रोटीन HOने की वज़ह की चर्चा बड़े फक्र से करने लगा। चर्चा ये की आज से कानपुर में ट्रेन्स की आटोमेटिक सिग्नल व्यवस्था की जानी प्रारम्भ कर दी गयी है जिसके कारण काफ़ी गाडियाँ रद्द कर दी गयीं .मुझे डर था की चित्रकूट एक्सप्रेस और मेमो भी इस युद्धस्तरीय कार्य के कारण प्रभावित होंगी अतःइसी आशंका में मैं अपने एक मित्र जो सोमवार की सुबह अपनी कार से लखनऊ जाते हैं , उनके साथ ही आगया चूंकि मैं आज रोतीं से हट कर ट्रेन से हट कर कार से आया था तो इसकी चर्चा भी लाजमी थी । लेकिन तभी बीच में ही बात काटते हुए एक साथी ने बोला - आज आप बेकार आए , आपका आना बेकार हुआ ! मैंने पूछा क्यूँ ? तो उसने कहा - आज एक सहयोगी मर गया इसलिए अभी कन्दोलेंस हो जायेगी .और ऑफिस बंद ! बस ! यहीं से इस मृत्यु प्रसंग पर मैं अभी तक विचार कर रहा हूँ ...मेरी नज़र में प्रसंग कुछ विडम्बना कुछ हमारी संवेदनहीनता कुछ घिसी-पिटी मान्यताओं के कारण वीभत्स सा हो गया है। किंतु मैं इसे कितनी देर अपने में समेटे बैठा रहता इसलिए यहाँ व्यक्त कर अपना तनाव प्रवाहित कर रहा हूँ। मेरे प्रिय कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कुछ पंक्तिया मेरे सर पर उस काव्यमय कथ्य में वर्णित तथ्य से आज की इस घटना को जोड़ने का निरर्थक प्रयास कर रही हैं -" घनी रात बादल रिम-झिम है , दिशा मूक ,निःशब्द वनांतर : व्यापक अन्धकार में सिकुडी सोयी नर की बस्ती भयकर ;जीवन लीला को समाप्त कर ,मरण सेज पर है कोई नर ; बहुत संकुचित छोटा घर है , दीपालोकित फ़िर भी धुंधला; वधु -मूर्छिता,पिता अर्ध-मृत ,दुखिया-माता -स्पंदनहीना; घनी रात बादल रिम-झिम है, दिशा मूक कवि का मन गीला ;यह सब क्षणिक , क्षणिक जीवन है , मानव जीवन क्षण भंगुर;" हम सब आज कितने खुश हैं आज श्री शंकर बाजपेयी के अचानक निधन से सोमवार का भी अवकाश हो गया । शोक संवेदना में अभी एक घंटा लग जाएगा निकलते नकलते १२ बज जाएगा ..एक साथी पूछ रहा है -" डेथ की ख़बर स्थापना चली गयी की नहीं?
मुझे आज और अभी टी वी टॉक के लिए दूर दर्शन केन्द्र प्रबंध निदेशक महोदय को ले जाना है , तुंरत उनसे बात कर आज की रिकॉर्डिंग की याद दिलाना है । अपने काम की ज़ल्दी में मैं शंकर की अभी थोड़ी देर पहले हुई मृत्यु पर बिल्कुल उदासीन अपने काम में तल्लीन हूँ। बाकी लोग इस बेचैनी में की ज़ल्दी छुट्टी हो । प्रबंध निदेशक के कमरे में हमारे संगठन के महामंत्री कुछ चर्चा कर रहे थे , मैं समझा की शोक संवेदना के लिए कर्मचारी को दिए जाने वाले तात्कालिक धन आदि के बारे में बात करने आए होंगे लेकिन पास जाकर देखा तो वह भी एक मेनेजर के ट्रान्सफर की सिफारिश कर रहे थे यानि शंकर की याद इन कर्मचारी नेता जी को भी !नहीं !प्रबंध निदेशक से चलने के लिए कहता हूँ वो तुंरत उठ कर चल देते हैं । शंकर एक अदना सा चपरासी उसके मरने पर अवकाश तो हो सकता है लेकिन संवेदना के दो शब्द किसी के पास नहीं हैं । मैं ख़ुद से पूछ रहा हूँ - तुम क्या कर रहे हो? सिक्यूरिटी गार्ड पूछता है क्या साब जिसकी डेथ हुयी है उसके घर जा रहे हो ? मैं न में सर हिलाता हूँ और विजय रावत की मोटर साइकिल पर बैठ जाता हूँ की कहीं दुबारा कुछ और न पूछ बैठे शंकर की मृत्यु के बारे में ॥ बैंक में मरघट सा सन्नाटा है ..सब लोग हंसते खिल खिलाते अपने - अपने घर जा चुके थे एक-दो लोग जो रुके थे वे दुखी थे इस बात से की प्रबंध निदेशक ने उन्हें बेकार रोक लिया काश! वो भी जा सकते! कोई दुखी नहीं है सिवा मुक्ति बोध की कविता के वे पात्र - वधु-मूर्छिता,पिता-अर्ध-मृत ,दुखिया माता,....पता नहीं कौन कौन होगा घर में। छुट्टी क्यों हुई? शायद पूर्व परम्परा के कारण ..बहुत पहले तो अगर किसी शाखा का कर्मचारी दूसरे जिले में मरजाता था तो बैंक का हेड ऑफिस पूरा बंद हो जाता था .बाद में इस प्रथा को समाप्त किया गया ..संवेदना हीन मशीनीकृत मनुष्य को किसी की मृत्यु विचलित नहीं करती वरन ये तो छुट्टी मनाने का एक अवसर बनकर आता है इसलिए मुक्तिबोध कहते हैं की "इस वीभत्स प्रसंग में रहते तुम अत्यन्त स्वतंत्र -निराकुल " शंकर तुम्हे हमारी अव्यक्त श्रृद्धांजलि !आज देखा मैंने ख़ुद की स्वार्थ लिप्तता जिसे एकाकी भवन तुम्हारे न होने पर वातावरण में प्रवाहित कर रहा था लेकिन महसूस केवल बैंक का पुराना भवन खंड जिसमें तुम अब नही हो तुम्हारी याद में निःशब्द था व्यथित था बस कोई और नही था उस व्यथा का साथी ..मैंने भी उस क्षण किनारा कर लिया जब उसे लगा की ये शायद शंकर को जानता होगा ये उस जगह ज़रूर आएगा जहाँ शंकर की याद में व्यथा क्रंदन कर रही थी आदमी का उससे कोई वास्ता न था । ये कहकर " शंकर शराबी था" सबने अपनी भाव श्रृद्धांजलि देदी थी । क्या कहूँ इस मृत्यु प्रसंग पर!
















Saturday, August 22, 2009

ये कैसी आज़ादी

तब दुःख था आजाद नहीं थे , अ़ब विस्मय कैसी आज़ादी !
खुदगर्जी ,बेईमानी, नफरत , हर घर आँगन में फ़ैल दी ;
क्या कहते इसको आज़ादी ?
गाँव हुए हैं बीहड़ जिनमें , अ़ब सूनापन झलक रहा है ;
अज्ञानी बन गए सयाने , सूखा सावन लूट रहा है ;
स्वर्ण कलश में कीचड भर कर , ढोंग स्वार्थ को नयी राह दी ।
क्या कहते इसको आज़ादी!
कौन बचा जीवित अब इसमें , जब अपना घर टूट रहा है ;
अंतस की आवाज़ सुने की जब कोलाहल गूँज रहा है;
मन की मन में रखने वालो - कायरता की क्या मिसाल दी !
क्या कहते इसको आजादी !
गाँव हमारा हमें ढूढता ,भूल गए माटी

का रिश्ता ;
खंडहरों के बीच पड़ा है ,बचपन के ख़्वाबों का बस्ता;
सत्ता भूखे नव-शेरों ने , शोषण की है मांग बढादी;
बोलो ये कैसी आज़ादी - क्या कहते इसको आजादी !

Tuesday, August 11, 2009

आज़ादी के मायने एक गंवाई मजदूर की नज़र में


हमने ख्वाहिश की थी की आप आज़ादी के बारे में बताएं की आप का क्या नजरिया क्या है हमें कुछ दार्शनिक टाइप के कुछ जवाब मिले भी ऐसा लगा जैसे ये विचार तो हैं लेकिन हमारी खयाली ज़िन्दगी के जैसे लगते है । आम ज़िन्दगी में हम न ऐसा सोचते हैं और न ही ऐसे हैं लेकिन आज महाकवि त्रिलोचन जी की एक कविता से आपकी वाकफियत करता हूँ आज़ादी के मायने गाँव के उस गरीब मजदूर की नज़र सेआखिर आज़ादी के क्या मायने हैं उस गरीब किसान के लिए ? एक जीवन दर्शन ये भी है जो सत्य है हकीकत है हमारे बहुसंख्यक गाँवके उन मजदूरों की जिनकी आवाज़ हैं महाकविं त्रिलोचन -

जब बाप मारा तब यह पाया -

भूखे किसान के बेटे ने

घर का मलबा टूटी खटिया -

कुछ हाथ भूमि - वह भी परती,

चमरौधे जूते का तल्ला - छोटी टूटी बुढिया औगी

दरकी गोरसी, बहता हुक्का

लोहे की पट्टी का चिमटा

कंचन सुमेर का प्रतियोगी- द्वारे का पर्वत घूरे का।

वह क्या जाने आज़ादी क्या

आजाद देश की बाते क्या?

Sunday, August 2, 2009

Swatantrata ka aakhir kya arth hai


Swatantrata ka aakhir kya arth hai mere apne liye ?
Maine apne ateet ,vartmaan aur bhavishy ke sandarbh mein lagaataar iske arth par vichaar kiya aur mahsoos karta hun ki Swatantrata sabhi ke liye chahe koyee kisi dharma jaati,ling athawa desh ka ho,sabke liye mahatwapurna hai.Aap is Aazaadi ke baare mein Kya sochte hain?
Is brahmaand mein sabhi ka astitwa hai lekin kuchh hi hain jo apne is astittwa ko sahi arth mein jaante hai aur zindagi ko jeete hain.Jeevan ko sahi dhang se samajhana aur tadanuroop rahna hamaari vaicharik saamartya par nirbhar karta hai.Jeevan aur usmein bhi maanav jeevan mein bina vichaarna ke yadi koyee jeevan ki kalpna karta hai to use aap kya kahenge?
Ham jo bhi hain apne inhi vicharon ki hi upaj hain.Bhagwaan Buddha ne kaha hai ki jo asatya mein satya ko dekhte hain ya khojte hain,tatha satay mein asatya ka sanshaya karte hain athawa satya mein asatya ko dekhtey hain, ve kabhi satya tak nhin pahunchte varan nirarthak kaamanayon mein jeevan nasht karte hain. Jo satya ke sarvbhaumik swaroop ko jantey hain tatha asatya ki nissarta ko pahchaantey hain wahi satya ke anugaami ban kar yatharth jeevan ki uchit aakanskshaon ko pura karne mein safal hote hain.To Swatantrata ka such aapki nazron mein kya hai arthat aapki vaicharik drishti swatantrata ke prati kya hai. hamein apaar harsh hoga aap apne bahumulya vicharon ko isi Island par hame bhej saken.
Shubh kaamnaaon sahit...
AApka hi
Awadhesh Kumar Misra