Saturday, August 22, 2009

ये कैसी आज़ादी

तब दुःख था आजाद नहीं थे , अ़ब विस्मय कैसी आज़ादी !
खुदगर्जी ,बेईमानी, नफरत , हर घर आँगन में फ़ैल दी ;
क्या कहते इसको आज़ादी ?
गाँव हुए हैं बीहड़ जिनमें , अ़ब सूनापन झलक रहा है ;
अज्ञानी बन गए सयाने , सूखा सावन लूट रहा है ;
स्वर्ण कलश में कीचड भर कर , ढोंग स्वार्थ को नयी राह दी ।
क्या कहते इसको आज़ादी!
कौन बचा जीवित अब इसमें , जब अपना घर टूट रहा है ;
अंतस की आवाज़ सुने की जब कोलाहल गूँज रहा है;
मन की मन में रखने वालो - कायरता की क्या मिसाल दी !
क्या कहते इसको आजादी !
गाँव हमारा हमें ढूढता ,भूल गए माटी

का रिश्ता ;
खंडहरों के बीच पड़ा है ,बचपन के ख़्वाबों का बस्ता;
सत्ता भूखे नव-शेरों ने , शोषण की है मांग बढादी;
बोलो ये कैसी आज़ादी - क्या कहते इसको आजादी !

2 comments:

Ankit said...

बहुत अच्छे भावः हैं.........

Unknown said...

aakhir ye paristhitiyan kyon upaji kaun zimmedaar hai hamaari aazaadi ko is tarah dooshit karne ke liye?bahut sundar abhivyakti!