Tuesday, August 11, 2009

आज़ादी के मायने एक गंवाई मजदूर की नज़र में


हमने ख्वाहिश की थी की आप आज़ादी के बारे में बताएं की आप का क्या नजरिया क्या है हमें कुछ दार्शनिक टाइप के कुछ जवाब मिले भी ऐसा लगा जैसे ये विचार तो हैं लेकिन हमारी खयाली ज़िन्दगी के जैसे लगते है । आम ज़िन्दगी में हम न ऐसा सोचते हैं और न ही ऐसे हैं लेकिन आज महाकवि त्रिलोचन जी की एक कविता से आपकी वाकफियत करता हूँ आज़ादी के मायने गाँव के उस गरीब मजदूर की नज़र सेआखिर आज़ादी के क्या मायने हैं उस गरीब किसान के लिए ? एक जीवन दर्शन ये भी है जो सत्य है हकीकत है हमारे बहुसंख्यक गाँवके उन मजदूरों की जिनकी आवाज़ हैं महाकविं त्रिलोचन -

जब बाप मारा तब यह पाया -

भूखे किसान के बेटे ने

घर का मलबा टूटी खटिया -

कुछ हाथ भूमि - वह भी परती,

चमरौधे जूते का तल्ला - छोटी टूटी बुढिया औगी

दरकी गोरसी, बहता हुक्का

लोहे की पट्टी का चिमटा

कंचन सुमेर का प्रतियोगी- द्वारे का पर्वत घूरे का।

वह क्या जाने आज़ादी क्या

आजाद देश की बाते क्या?

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