Monday, June 21, 2010

मेरे जन्म दिन का अर्थ !

मेरे जनम दिन का अर्थ
२२ जून २०१० जिसने एक ऐतिहासिक सच कि कल्पना की कि आज दो-दो सूरज धरती पर दिखाई देंगे। २१ जून का दिन तो भागोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है ही कि वो वर्ष का सबसे बड़ा दिन होता है लेकिन २२ जून इसलिये महत्वपूर्ण माना जायेगा कि आज दुनिया को दो- सूर्य दिखाई देंगे। मगर केवल उन्हें जो सूर्य कि लालिमा के चहेते हैं जिन्हें प्रकृति में सर्वश्व दिखाई देता है। मैं भी खुद को बड़ा भाग्यवान समझता था कि भागीरथ के पुण्य से गंगा के प्रथ्वी पर अवतरण कि शुभ बेला में मेरा जन्म हुआ सबसे बड़ा दिन कहा गया उसे लेकिन इस महान तिथि को जन्म लेने मात्र से कोई कैसे महान हो जायेगा ये बात अब मेरी समझ में कुछ- कुछ आने लगी और मैं अपनी इस जन्म तिथि से थोडा डरने लगा । प्रकृति में परवर्तन को उजागर करने वाले इस बड़े दिन पर जन्म लेने वाले भी इस दिन की तरह महान होंगे ये कैसे संभव हो सकता है। आज के दिन अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाने तथा लोक कल्याण के लिए भागीरथ के तप के परिणामस्वरुप शश्य श्यामला धरती को हरियाली देने का पुण्य तो हमें नहीं मिल सकता .घर में हमारे एक चाचा जी जो विगत छह माह से लकवे से ग्रस्त अपाहिज बने पड़े हैं ,ज़िन्दगी के नाम पर थोड़ी सी चेतना और बिस्तर पर जन्मे घावों की मर्मान्तक पीड़ा से कराहते कराहते बेजान होते अपनी बेचारगी और उस करुनामय की निष्ठुरता का अंतहीन सा संघर्ष - क्या इस भागीरथ के ऐतिहासिक दिन पर कोई चमत्कार कर उन्हें पीड़ा मुक्त करा सका ? क्या बेरोजगारी की मार झेलते लगातार प्राइवेट कंपनी में छोटी पगार से अच्छी पगार की उम्मीद लगाए अपने मामा की तरफ कुछ मदद चाहने वाले अपने भांजे के लिए कोई सहारा बन सका ? पड़ोस में रहने वाले अपने मित्र की विधवा के प्लाट पर ज़बरन कब्ज़ा करने वाले असामाजिक तत्वों से मुकाबला कर उनका प्लाट उन्हें दिला सके? अपने मित्रो के बेटे जो अच्छी नौकरी के लिए डिग्रियों का ढेर इकठा कर रहे हैं उन्हें कोई कायदे की सलाह देकर उनके दुःख दूर कर सके ? अपने ही बैंक में कोई ऐसा काम जिससे बैंक की तरक्की होती मैंने किया ? दुखों के सागर में डूबते उतराते हमारे आस-पास जिन्हें हम सहारा दे सकते थे क्या उन्हें मैंने कुछ दिया? इन सब का उत्तर केवल और केवल 'न' है। तब इस बड़े दिन पैदा होने का क्या अर्थ है? हाँ संत कबीर के इस बात को स्वीकारने की सामर्थ्य ज़रूर मिली है - '' बुरा जो देखन मैं चल्या बुरा न मिल्या कोय , जो मन खोजा आपनो तो मुझ सा बुरा न कोय .''

Sunday, June 13, 2010

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Sunday, May 23, 2010

सप्त- स्वर की भाव भूमिका --पचास वर्षों का सफ़र




सप्त-स्वर द्वारा भारत नाट्यम शास्त्रीय नृत्य परंपरा के कानपूर में पचास वर्ष के उपलक्ष्य में नृत्य एवं संगीत का दो दिवसीय आयोजन दिनांक २७ व् २८ मई को कानपूर के मोतीझील स्थित लाजपत भवन प्रेक्षागार में किया गया है। कार्य क्रम का पहला दिन " निवेद्यतम सौरभीयम " अर्थात दक्षिण भारतीय शाश्त्रीय नृत्य - भरत नाट्यम के कानपूर में प्रतिस्थापक गुरु श्री युत श्री धरन नायर को श्रद्धा सुमन समर्पित करते हुए, उनकी परंपरा का मनोहारी नैवेद्य कानपूर के दर्शकों को वितरित करना। इस कार्य क्रम में निष्ठा शर्मा एवं उनकी शिष्याएं भरत नाट्यम की बहु रंगी कलाओं के साथ अलग अलग एवं समूह में नृत्य प्रस्तुत करेंगी ।
यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि निष्ठा शर्मा गुरु श्रीयुत श्री धरन नायर की शिष्या हैं । वर्ष १९५१ में श्री धरन जी कानपूर में आये, वर्ष 1956 में कुछ लोगों ने उनसे भरत नाट्यम का प्रशिक्षण भी लिया किन्तु एक संस्थागत नियमित भरत नाट्यम का प्रशिक्षण कार्यक्रम उनके द्वारा १९६० से प्रारंभ किया गया जो अनवरत अभी तक सुव्यवस्थित ढंग से चलाया जारहा है। पहले नृत्य प्रशिक्षण स्वयं गुरु जी (श्री धरन नायर ) द्वारा ही दिया जाता था। लेकिन उनके कानपूर से लखनऊ प्रस्थान करने के उपरान्त ये कार्य उनकी सुयोग्य शिष्या निष्ठा द्वारा पूरे समर्पण के साथ किया जा रहा है। निष्ठा ने गुरु श्रीयुत श्री धरन नायर के सानिध्य में भारत नाट्यम की बारीकियों तथा गति मुद्रा आदि का सफल प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने गुरु का आशीर्वाद प्राप्त किया गुरु श्रीधरन नायर ने उन्हें कानपूर में नृत्य प्रशिक्षण के हेतु अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए इस कार्य को निरंतर चलाये रखने के लिए परम्परा कमान सौंप दी । निष्ठा बहुमुखी प्रतिभा कि धनी हैं । भरत नाट्यम में अलंकार की उपाधि अर्जित करने के पश्चात उन्होंने संगीत (गायन) में परास्नातक कि उपाधि ली तदनंतर विश्ववद्यालय प्रवक्ता हेतु निर्धारित नेट में भी सफलता प्राप्त की निष्ठा ने संगीत में पी एच.डी हेतु अपनी थीसिस विश्ववद्यालय में प्रस्तुत कर दी है। नृत्य एवं संगीत के साथ कानपूर के रंगमंच पर भी अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है । उत्तर भारत कि सुविख्यात नाट्य संस्था दर्पण के सभी संगीतमय नाट्य प्रस्तुतियों में कोरिओग्राफी एवं नृत्य निर्देशन निष्ठा द्वारा ही किया गया है। निष्ठा एक संवेदन शील अभिनेत्री, नृत्य निर्देशिका, गायिका, नृत्य एवं गायन प्रशिक्षिका के साथ साथ कानपूर के सांस्कृतिक समूह की विशिष्ट एवं समर्पित कार्य कर्त्री हैं । २७ मई का होने वाला नृत्य आयोजन एवं उनके निर्देशन में नृत्य प्रस्तुतीकरण कानपूर के नगर वासियों के लिए विशेष आकर्षण होगा।

दिनांक
२८ मई २०१० को सुविख्यात गायिका और कवियत्री सीमा अनिल सहगल का संगीतमय कार्यक्रम होगा । कदाचित सीमा सहगल कानपूर में पहली बार आ रही हैं । लेकिन उनकी गायकी लाजवाब है। वे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति कि गायिका हैं। उनकी एल्बम सरहद बहुत ही लोकप्रिय एल्बमों में से है। उन्हें पीस सिंगर आफ इंडिया, कश्मीर कि कोकिला आदि विशेषणों से नवाज़ा जा चूका है। दिनांक २८ मई २०१० को सीमा सहगल की गायकी से सजी संवरी ग़ज़ल संध्या निश्चय ही एक अविस्मरनीय शाम होगी। साम्प्रदायिक सौह्राद के लिए गीतों कोप्रस्तुत करने कि सीमा सहगल कि ख्याति कानपुर में कितना सद्भाव जनमानस तक पंहुचा पाएंगी ये ये उनके कार्य क्रम कि कानपूर वासियों कि सहज प्रतिक्रिया स्वतः बता देगी। आप अगर इस ब्लॉग को पढ़ें तो दिनांक २७ व् २८ मई को शाम ७-३० बजे से नृत्य और ग़ज़ल गायकी से सजी लाजपत भवन मोतीझील में आयोजित संध्या में अवश्य आयें।






























































































































































































Saturday, March 13, 2010

Lok Prasang: पर्दा नहीं जब कोई खुदा से बन्दों से पर्दा करना क्या !

Lok Prasang: पर्दा नहीं जब कोई खुदा से बन्दों से पर्दा करना क्या !

पर्दा नहीं जब कोई खुदा से बन्दों से पर्दा करना क्या !




मोहब्बत करने वालों के लिए तो हर दिन वलेनटीन डे है। ऐसे में किसी को क्या पडी है जो दो मोहब्बत करने वालों को रोके । लेकिन देखने वालो का दिल है इन प्रेमियों को देख कर मचल उठता है। और कुछ तो कर नहीं सकते इसलिये जलन से ही काम चला लेते हैं । ऐसा मैं अक्सर सोचा करता था .लेकिन आज तो लगता है मैं भी उसी कतार में खड़ा हो गया हूँ। बार बार वही दृश्य नज़र के सामने आजाता और मजबूर होकर मैं अपना बवाल इस ब्लॉग के मत्थे डाल रहा हूँ । ११ मार्च को हमारे बैंक के मुख्य महा प्रबंधक की वयोवृद्ध माता जी का स्वर्गवास हो गया । मुझे मालुम हुआ तो मैं भी श्री आर.के.सिंह और श्री ऐ.के-प्रधान के साथ भैंसा कुंद जा पहुंचा। लेकिन हमारे पहुचने का कोई अर्थ नहीं था संस्कार करने वाले परिजन तथा हमारे सी.जी-एम् साहेब वापस जा चुके थे .ए.जी .एम् साहेब श्री आर.के .सिंह ने सुझाव दिया की बैंक के प्रदर्शनी हाल में डाक्टर लोहिया के छाया चित्र के साथ उनके सिद्धांतों को दर्शाता कोई अच्छा महावाक्य पास में ही लोहिया गार्डेन से नोटकर लिया जाय । मुझे इस विचार के पालन में कोई दिक्कत नहीं थी अतः हम तीनों तुरंत लोहिया पार्क जा पहुंचे .लोहिया पार्क में प्रवेश हेतु पांच रुपये का एक व्यक्ति का टिकट लेना ज़रूरी है जिसे श्री प्रधान साहेब ने हम लोगों के अपने वाहन जमा करने के दौरान खरीद लिए और हम लोग लोहिया गार्डेन में अन्दर जा पहुंचे। लोहिया जी के महावाक्य के शिला लेख तो आस पास नहीं दिखे हाँ चारों तरफ प्रेमी युगल लेते बैठे टहलते , कुछ प्राक क्रीडा में मग्न , कुछ अठखेलियाँ करते चाह्चाते आपस में चुहल बाज़ी करते दिखाई पड़े। लोहिया पार्क का नज़ारा प्रमियों के रोमांस से सरबोर था और हम निगाह नीचे किये हुए भी किसी न किसी प्रेमी युगल के निकट से गुजरने के लिए मजबूर थे । हमें संकोच था की हमारे देखने और उपस्थिति से कहीं उन्हें व्यवधान न हो लेकिन वो इतने उतावले की सब कुछ कर दिखाने को लालायित । बहुत अन्दर जाने पर हमें एक शिला लेख दिखा .शिला लेख में अंकित " ऐ भारत माता ! हमें शिव का मस्तिष्क दो, कृष्ण का हृदय दो तथा राम का कर्म और वचन दो ।" हमें प्रेरणा दाई प्रतीत हुआ तो उसे नोट करने के लिए एक अदद पेन तथा एक कोरे कागज़ की दरकार थी .तभी देखा उसी शिला की धोक लगाए मन वचन कर्म से समर्पित एक युगल को प्रेमालाप करते देखा तो हम सब थोडा ठिठके । थोडा पीछे हटने का उपक्रम किया तो युगल ने हमें दिखाते हुए अपने प्रेमालाप की प्रगाढ़ता को और अधिक दर्शनीय बनाने के साथ गर्वोंमुक्त मुस्कान के साथ अहसास दिलाया मुझे तुम्हारी उपस्थिति की परवाह नहीं .मेरा साहस में इजाफा हुआ । मैं थोडा आगे बढ़ कर उनके पास गया लेकिन वो अपनी मस्ती में एक दूसरे को आगोश में भरे तल्लीन रहे । मैं हेल्लो कहते हुए उनसे मुखातिब हुआ तो लड़की ने अपने अंदाज़ के साथ जवाब दिया ये..एस..! मैंने विनम्रता और क्षमा याचना करते हुए कागज़ और कलम की मांग की तो उसने धीरे से बगल में पड़े अपने पर्स को अपनी उसी मुद्रा में पड़े तहते हुए उठाया और अपनी पूरी नोट बुक हमें पकड़ा दी । मैं लोहिया जी का महावाक्य मांगी गयी नोट बुक में लिख रहा था " मैं चाहता हूँ लोग एक जीवन मान प्राप्त करें लेकिन ऐसा न हो की जीवनइस्तर के लिए कालीन और कुर्सियों के गुलाम बन जाएँ ।" जो समूह और जातीय तिरस्कृत हैं उन्हें विशेष रूप से और सहारा देकर उठाना होगा । " प्रेम प्राकट्य की वर्जनाहीनता " ऊपर उठने से पहले नीचे की ओर जाने का सुगम रास्ता प्रतीत हुआ लेकिन उन्हें नहीं मुझ जैसे मूढ़ लोगों को जो उनकी दीवानगी को अपने नज़रिए से तौलरहे थे । मैं जहाँ इन द्रश्यों को नित्य-प्रति होने वाली बलात्कार घटनाओं से जोड़ रहा था वहीँ लोहिया पार्क में तल्लीन युगल खुद को बेपरवाह और साहस की मिसाल के रूप में दुनिया को चुनौती डे रहे थे-और ये अहसास करा रहे थे की प्यार किया तो डरना क्या,---

Tuesday, March 2, 2010

होली और भैयादूज

दुःख और पीड़ा के मध्य कैसे छोटी-छोटी घटनाओं को संजोकर एक सुख का बनाया जाय शायद इसी की अनुभूति कराने के लिए हनारी संस्कृति में इन त्योहारों को बनाया गया । वर्ष १९७५ में होली के पांच दिन पहले मेरे पिता जी का अचानक स्वर्गवास हो गया। अचानक परिवार पर आयी मुसीबत को समझने की अक्ल मुझमें नहीं थी बस हर परिस्थिति को देखता रहा और जो ठीक लगा करता रहा। फिर ये लगा कि जीवन में एक अनुशाशन होना चाहिए । क्योंकि मेरे पिताजी स्वभाव से मस्त थे उन्होंने खान-पान से लेकर पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन में कभी कोई दूरदर्शिता नहीं अपनाई। अच्छा खाना, खुश रहना और मस्ती का आलम बनाए रखने के लिए अपने साथियों के साथ मिलकर नाटक राम लीला आदि के आयोजन कराना , गाँव में उस ज़मानें में कोई उच्च शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी तो अपने दोस्तों के साथ मिलकर हायर सेकेंडरी और फिर बाद में इंटर कालेज खोलना और उसी में इतने खो गए कि अपनी सेहत का कोई ख़याल नहीं रखा ,दिल का दौरा पड़ा और चल बसे। और छोड़ गए अपने पीछे कच्ची गृहस्ती । मुझे ज़िन्दगी का सही मतलब पाता नहीं था आगे क्या करना है वो भी कभी नहीं सोचा ये ज़रूर लगता था कि पिताजी इतने ठाट -बात से रहते हैं तो मै भी ऐसे ऐश कि ज़िन्दगी गुजारूं और इसके लिए तुरंत की ज़रूरतों के के लिए कोई भी छोटी मोटी नौकरी की ज़बरदस्त चाह । और वो भी पूरी होगई जब मुझे भूमि विकास बैंक में सहायक की नौकरी मिलगई । अभी नौकरी की शुरुआत ही हुयी थी कि पिता जी चल बसे । गाँव में माँ तीन बहन और एक बिगडैल बड़ा भाई .एक बाप मारा तो सौ बाप सलाहकार बनकर सामने खड़े थे जिसकी न मानो वही नाराज़ ध्वस्त होते संयुक्त परिवार की मरी परम्पराओं में मैं और मेरा परिवार घिरा था जिसकी बागडोर भगवान् भरोसे थी .अम्मा को मेरा रवैया समझ में नहीं आ रहा था। चाचा ,जो ताऊजी और पिता जी की मौत के बाद हमारे परिवार के मुखिया थे , अपनी अफसरी के रौब में रहते पारिवारिक जिम्मेदारियों के लिए ले दे कर मेरी छोटी सी नौकरी जो ऐश करने के लिहाज से शुरू की थी आज कि सबसे बड़ी ज़रूरत बन गयी .तभी रेडियो स्टेशन पर उद्घोषक में भी चयन हो गया तो बैंक की नौकरी के साथ रेडियो पर कैजुअल अन्नौंसर के रूप में जो मिलता परिवार पोषण में लगाता। कभी ये महसूस नहीं कर पाया कि इन सबके बीच कोई दुःख भी है अपनी मस्ती में कमी नहीं आयी .लेकिन अब पता नहीं क्यूँ वो मस्ती कहीं भटक गयी। इस साल नए साल की शुरुआत मेरे संयुक्त परिवार में रह रहे चाचा जो निहायत सरल स्वाभाव के हैं नौकरी से रिटायर होने के बाद पूरे नियम और संयम के साथ अपना जीवन लेखन और पठान पाठन में व्यतीत कर रहे थे। कि अचानक उन्हें पक्षाघात पड़ा .उस दिन रात को चन्द्र गृहण था । पहली जनवरी की शुरुआत का सूरज अभी निकला भी नहीं था कि अचानक बगल के कमरे से मेरी चचेरी बहन कि जोर से चीखने कि आवाज़ सुनायी दी । बाद हवास सा उनके कमरे की ओरे भागा ही था कि देखा औंधे मुंह चाचा बिस्तर से आधे ज़मीन पर गिरे पड़े थे विश्वास नहीं हुआ कि ऐसा कैसे हो सकता है। लेकिन ऐसा हुआ जो साफ़ दिख रहा था । मेरी सोच पर वज्रपात हो गया । मेरी मस्ती पर अनचाहा धक्का लगा । मैं जहाँ का तहां रूक गया । होली पर भी ऐसा रहा । लेकिन आज भाई दूज पर मेरा मन तुझ पर निसार हो गया । तेरा प्यार तेरा अपने पापा के प्रति समर्पण और सेवा उन्हें खुश रखने की तेरी तरकीबें मेरी मस्ती को नया जीवन दे रही हैं । होली कि संध्या पर हम सभी चाचा के कमरे में उनके आशीर्वाद के लिए उनके सामनेथे और वो अपने बेचारगी पर फूट फूट कर रो रहे थे । तभी तुमने उन्हें एक भजन सुनाया " इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो न " चाचा रोते रोते अपना दुःख पीने कि कोशिश करते करते सजग हो गए और अपने अन्दर उस विश्वास को खोजने लगे जिसकी फरमाइश शालू अपने भजन के माध्यम से उस परवरदिगार से कर रही थी । थोड़ी देर में ही चाचा खुद में मजबूती लाने में जुट गए। मैं ये सब होते देख रहा था । और आज जब भैया दूज का टीका तुम कर रही थी तो मैं भी तुम्हारे हाथ के रुचने में उसी विश्वास की शक्ति का मजबूत हाथ अपने मस्तक पर महसूस कर रहा था । तुम शक्ति का आधार बनकर चाचा को भरोसा दिला सकती हो तो मैं क्यूँ नहीं उस भूली हुयी मस्ती को तुम्हारे माध्यम से पा सकता। तुम्हारे संरक्षण में शक्ति पलती है। भाई तुम्हे क्या सहारा देगा तुम तो पोषण करने वाले को भी शक्ति का अहसास करा रही हो। मेरा भैया दूज अविस्मरनीय है।

Sunday, February 28, 2010

Lok Prasang: भूमि विकास बैंक के सृजनकर्त्ता का महाप्रयाण

Lok Prasang: भूमि विकास बैंक के सृजनकर्त्ता का महाप्रयाण

भूमि विकास बैंक के सृजनकर्त्ता का महाप्रयाण

वर्ष १९५५-५६ में पी सी एफ प्रेस में प्रतिनियुक्ति पर कार्य कर रहे सहकारिता के सहकारी निरीक्षक संवर्ग के श्री शिव नारायण त्रिपाठी जो एक धर्म भीरु समर्पित अधिकारी थे , को कदाचित इस बात का अहसास नहीं होगा की वे प्रदेश के सहकारिता आन्दोलन में विकास का एक नया अध्याय रचाने जा रहे हैं .सहकारिता के माध्यम से ग्रामीण प्रगति का शिलान्यास अर्थात प्रदेश में किसानो के कल्याण की एक ऐसी सुदृढ़ इकाई जो ग्रामीण बैंकिंग का आधार बनी और सहकारिता में किसानो के लिए दीर्घ कालीन वित्त पोषण के माध्यम से सहकारी आन्दोलन से रूबरू होने का सुनहरा अवसर - क्योंकि देश में आजादी से पहले से स्थापित सहकारी आन्दोलन की नीव के रूप में अल्पकालिक और मध्यकालिक साख समितियां और सहकारी बैंक किसानो को न तो ऋण ग्रस्तता से बचाने में ही सफल थे और न ही ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था को सही ढंग से चला पा रहे थे । भारतीय किसान की दुर्दशा बाद से बदतर थी .राजनैतिक आज़ादी तो मिल गयी लेकिन देश का ९० प्रतिशत भाग जो खेती किसानी से पोषित था देश की बदहाली की कहानी बयान कर रहा था। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा गठित ग्रामीण साख सर्वेक्षण समिति की रिपोर्ट में सहकारी आन्दोलन के असफल होने की बात तो स्वीकार की लेकिन साथ में यह भी सिफारिश कर डाली कीगाँव की दश सुधारने के लिए सहकारी आन्दोलन ही एक मात्र विल्कल्प है और इसे सफल होना ही चाहिए। द्वितीय पञ्च वर्षीय योजना में सहकारिता को विकास योजना का हिस्सा मानते हुए किसानों के हित में सहकारी दीर्घ कालीन ऋण सुविधा हेतु भूमि बंधक बैंक की स्थापना को अनिवार्य मानते हुए तत्काल इसके प्रारम्भ के निर्देश भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा दिए गए और इन्हीं सिफारिशों के अंतर्गत श्री शिव नारायण त्रिपाठी को दीर्घ कालीन ऋण व्यवस्था के सघन प्रशिक्षण हेतु सहकारिता विभाग द्वारा नामित किया गया .श्री त्रिपाठी द्वारा इस प्रशिक्षण के उपरान्त भी उत्तर प्रदेश शाशन तथा सहकारिता विभाग प्रदेश में भूमि बंधक बैंक की स्थापना के प्रति उदासीन से रहे अंततः पुनः भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा इस दिशा में तुरत कार्यवाही के निर्देश के साथ ये चेतावनी की यदि दीर्घ कालिक ऋण व्यवस्था हेतु एक अलग संस्था की सहकारिता विभाग द्वारा स्थापना तुरंत नहीं की जाती है तो भारतीय रिजर्व बैंक अल्प कालिक वित्त हेतु डी जा रही सहायता तुरंत बंद कर देगा और तदनंतर आनन् फानन भूमि बंधक बैंक की स्थापना की समस्त औपचारिकताएं पूर्ण करते हुए बिना कीसि समुचित आकार एवं कार्य प्रणाली निर्धारित किये १२ मार्च १९५९ को बैंक की स्थापना की घोषणा कर डी गयी और श्री त्रिपाठी इस बैंक के महाप्रबंधक के रूप में निर्माण संरचना में जुट गए.श्री त्रिपठी जी ने यह महसूस किया की भूमि बंधक बैंक नाम इस की कार्य प्रणाली से अलग सा लगता है अतः उन्होंने इसे भूमि बंधक बैंक से भूमि विकास बैंक नाम दिए जाने का सुझाव प्रस्तुत किया किन्तु शाशन स्टार पर इस सुझाव पर शुरुआत में पूरी उदासीनता दिखाई गयी क्योंकि अन्य प्रदेशों में तब भूमि बंधक बैंक नाम सामान्य रूप से अपनाया जा चूका था । श्री त्रिपाठी जी ने पुनः एक बार सभी राज्यों के भूमि बंधक बैंकों का नाम भूमि विकास बैंक किये जाने का प्रस्स्ताव भारतीय रिजर्व बैंक तथा शाशन को न केवल प्रस्तावित किया वरन इस नाम की उपादेयता तथ औचित्य को स्पष्ट करते हुए इसे लागू कराने के लिए लगे रहे और अंततः वे नाम परिवर्तित कराने के इस अभ्याँ में सफल रहे जिससे न केवल उत्तर प्रदेश वरन पूरे देश में कार्य रत सभी भूमि बंधक बैंक - भूमि विकास बैंक के नाम से संशोधित कर दिए गए । ये श्री त्रिपाठी जी का प्रथम उल्लेखनीय योगदान एवं उपलब्धि थी । इसके बाद बैंक के एकात्मक स्वरुप तथा कार्यप्रणाली एवं व्यवसाय संवर्धन हेतु उन्होंने पूर्ण समर्पण भाव से बैंक को उत्तरोत्तर आगे बढाने में कोई कस्सर नहीं छोड़ी उनकी निष्ठां एवं बैंक के प्रति समर्पण का ये परिणाम था की भूमि विकास बैंक और श्री त्रिपाठी एक दूसरे के पर्याय कहलाते थे । पिछले महीने मैं उनसे बैंक के पचास साल पूरे होने के अवसर पर बैंक के वर्तमान प्रबंध निदेशक महोदय ( श्री नवल किशोर ) द्वारा बैंक के प्रारंभ से अब तक के विकास के इतिहास पर आधारित वृत्त चित्र निर्माण कराये जाने के दिए गए दायित्व के सिलसिले में श्री त्रिपाठी जी से मिलने फैजाबाद गया था जहाँ उनसे बैंक के बारे में काफी लम्बी बात हुयी.वस्तुतः बैंक के नाम परिवर्तित कर विकास का जो मिसन उन्होंने स्थापित किया वह बैंक की आत्मा बन गया .लोक मंगल में अपना जीवन लुटाने वाले समय की आग में ताप कर खरा सोना बन जाते हैं.आदरणीय श्री त्रिपाठी जी ने बैंक के महाप्रबंधक पद पर कार्य करते हुए अपने कर्मठ एवं सक्रीय योगदान की ज्वलंत मिसाल से पूरे देश में सहकारिता के विकास को एक सकारात्मक रूप प्रदान किया । बैंक की स्थापना के पूर्व से लेकर वर्ष १९६८ तक आप बैंक के कर्ण धार रहे .अपने कार्यकाल में आपने बैंक को स्वाबलंबी बनाने के लिए सुदृढ़ नीतियाएवं कार्यशैली अपनाई जो बैंक के साथ साथ किसानों के लिए हितकारी थीं । सादा जीवन उच्च विचार के प्रतीक श्री त्रिपाठी जी किसानों एवं गाँव की उन्नति के लिए बैंक को और अधिक बेहतर बनाने के लिए नित नयी कार्य योजनाओं में तल्लीन रहते.आपने न्यूनतम ब्याज दर पर किसानों को वित्तीय सुविधा प्रदान करा कर बैंक की लोकप्रयता में चार चाँद लगाए.वे मात्र रचनात्मक कार्यकर्त्ता ही नहीं बल्कि लोक जीवन से जुड़े सपूत थे .भमि विकास बैंक एवं सहकारिता के अतिरिक्त आप ग्रामीण विकास की अनेक संस्थाओं के नीव के पत्थर रहे .आपने यूं पी अग्रो तथा पूर्वांचल विकास निगम की स्थापना में अपना बहुमूल्य योगदान दिया .सुल्तानपुर जिले के ग्रामम देवरी तारणपट्टी पोस्ट परसा ददवा में तीन जनवरी १९१९ को जन्में श्री त्रिपाठी जी जीवन भर सच्चाई, ईमानदारी एवं कर्मठता की मिसाल बने रहे । उन्होंने कभी किसी स्वार्थ के लिए अपने आदर्शों एवं जीवन मूल्यों पर आंच नहीं आने दी । आत्मा प्रचार से दूर , सर्व सुलभ व्यक्तित्व ,वैचारिक सम्पदा के धनी आदरणीय श्री त्रिपाठी जी की कथनी करनी में एकरूपता जीवन पर्यंत रही । विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने कभी अपनी सादगी और दृढ़ता नहीं छोड़ी.अपनी पैत्रक भूमि से सदैव जुड़े रहते हुए वे फैजाबाद में स्थाई रूप से अध्यात्मिक दिन चर्या के साथ जीवन गुजार रहे थे । गत ९ फरबरी २०१० को अपने फैजाबाद स्थित आवास पर सहकारिता के इस समर्पित सेनानी ने महा प्रयाण किया । नाती पोते पोतियों पुत्र एवं पुत्र वधुओं से भरे पूरे परिवार में उनकी जीवन शैली तथा आदर्शों की कहानियाँ रह गयी हैं .उनके अवसान के साथ ही सहकारिता की एक दैदीप्यमान ज्योति विलुप्त हो गयी।" सदियों बाद पैदा होता है एक महा पुरुष और दिखा जाता है हमें रोशनी की अनगिनत रहें।"

Saturday, February 13, 2010

shaadi ki teesavin Varshgaanth Mubaarak


सुख-दुःख मिश्रित इस जीवन की,

वो घड़ियाँ याद तुम्हें होगीं,

पीड़ा में सुख सुख में पीड़ा

अनवरत व्यथाएं भी भोगीं

ये तीन दशक- बीते टक-टक,

ये अंतरंगता आकर्षक

अविराम तृप्ति अनुभूति अमल,

ज्योतिर्मय जीवन सुख के पल

ये रहें सहोदर जीवन भर,

पल्लवित प्रेम यूँ रहे अमर

--प्रिय सुहृद राजीव और सुमन भाभी को ३०वी संनिध्यता की वर्षगाँठ मुबारक