Tuesday, March 2, 2010

होली और भैयादूज

दुःख और पीड़ा के मध्य कैसे छोटी-छोटी घटनाओं को संजोकर एक सुख का बनाया जाय शायद इसी की अनुभूति कराने के लिए हनारी संस्कृति में इन त्योहारों को बनाया गया । वर्ष १९७५ में होली के पांच दिन पहले मेरे पिता जी का अचानक स्वर्गवास हो गया। अचानक परिवार पर आयी मुसीबत को समझने की अक्ल मुझमें नहीं थी बस हर परिस्थिति को देखता रहा और जो ठीक लगा करता रहा। फिर ये लगा कि जीवन में एक अनुशाशन होना चाहिए । क्योंकि मेरे पिताजी स्वभाव से मस्त थे उन्होंने खान-पान से लेकर पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन में कभी कोई दूरदर्शिता नहीं अपनाई। अच्छा खाना, खुश रहना और मस्ती का आलम बनाए रखने के लिए अपने साथियों के साथ मिलकर नाटक राम लीला आदि के आयोजन कराना , गाँव में उस ज़मानें में कोई उच्च शिक्षा की व्यवस्था नहीं थी तो अपने दोस्तों के साथ मिलकर हायर सेकेंडरी और फिर बाद में इंटर कालेज खोलना और उसी में इतने खो गए कि अपनी सेहत का कोई ख़याल नहीं रखा ,दिल का दौरा पड़ा और चल बसे। और छोड़ गए अपने पीछे कच्ची गृहस्ती । मुझे ज़िन्दगी का सही मतलब पाता नहीं था आगे क्या करना है वो भी कभी नहीं सोचा ये ज़रूर लगता था कि पिताजी इतने ठाट -बात से रहते हैं तो मै भी ऐसे ऐश कि ज़िन्दगी गुजारूं और इसके लिए तुरंत की ज़रूरतों के के लिए कोई भी छोटी मोटी नौकरी की ज़बरदस्त चाह । और वो भी पूरी होगई जब मुझे भूमि विकास बैंक में सहायक की नौकरी मिलगई । अभी नौकरी की शुरुआत ही हुयी थी कि पिता जी चल बसे । गाँव में माँ तीन बहन और एक बिगडैल बड़ा भाई .एक बाप मारा तो सौ बाप सलाहकार बनकर सामने खड़े थे जिसकी न मानो वही नाराज़ ध्वस्त होते संयुक्त परिवार की मरी परम्पराओं में मैं और मेरा परिवार घिरा था जिसकी बागडोर भगवान् भरोसे थी .अम्मा को मेरा रवैया समझ में नहीं आ रहा था। चाचा ,जो ताऊजी और पिता जी की मौत के बाद हमारे परिवार के मुखिया थे , अपनी अफसरी के रौब में रहते पारिवारिक जिम्मेदारियों के लिए ले दे कर मेरी छोटी सी नौकरी जो ऐश करने के लिहाज से शुरू की थी आज कि सबसे बड़ी ज़रूरत बन गयी .तभी रेडियो स्टेशन पर उद्घोषक में भी चयन हो गया तो बैंक की नौकरी के साथ रेडियो पर कैजुअल अन्नौंसर के रूप में जो मिलता परिवार पोषण में लगाता। कभी ये महसूस नहीं कर पाया कि इन सबके बीच कोई दुःख भी है अपनी मस्ती में कमी नहीं आयी .लेकिन अब पता नहीं क्यूँ वो मस्ती कहीं भटक गयी। इस साल नए साल की शुरुआत मेरे संयुक्त परिवार में रह रहे चाचा जो निहायत सरल स्वाभाव के हैं नौकरी से रिटायर होने के बाद पूरे नियम और संयम के साथ अपना जीवन लेखन और पठान पाठन में व्यतीत कर रहे थे। कि अचानक उन्हें पक्षाघात पड़ा .उस दिन रात को चन्द्र गृहण था । पहली जनवरी की शुरुआत का सूरज अभी निकला भी नहीं था कि अचानक बगल के कमरे से मेरी चचेरी बहन कि जोर से चीखने कि आवाज़ सुनायी दी । बाद हवास सा उनके कमरे की ओरे भागा ही था कि देखा औंधे मुंह चाचा बिस्तर से आधे ज़मीन पर गिरे पड़े थे विश्वास नहीं हुआ कि ऐसा कैसे हो सकता है। लेकिन ऐसा हुआ जो साफ़ दिख रहा था । मेरी सोच पर वज्रपात हो गया । मेरी मस्ती पर अनचाहा धक्का लगा । मैं जहाँ का तहां रूक गया । होली पर भी ऐसा रहा । लेकिन आज भाई दूज पर मेरा मन तुझ पर निसार हो गया । तेरा प्यार तेरा अपने पापा के प्रति समर्पण और सेवा उन्हें खुश रखने की तेरी तरकीबें मेरी मस्ती को नया जीवन दे रही हैं । होली कि संध्या पर हम सभी चाचा के कमरे में उनके आशीर्वाद के लिए उनके सामनेथे और वो अपने बेचारगी पर फूट फूट कर रो रहे थे । तभी तुमने उन्हें एक भजन सुनाया " इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो न " चाचा रोते रोते अपना दुःख पीने कि कोशिश करते करते सजग हो गए और अपने अन्दर उस विश्वास को खोजने लगे जिसकी फरमाइश शालू अपने भजन के माध्यम से उस परवरदिगार से कर रही थी । थोड़ी देर में ही चाचा खुद में मजबूती लाने में जुट गए। मैं ये सब होते देख रहा था । और आज जब भैया दूज का टीका तुम कर रही थी तो मैं भी तुम्हारे हाथ के रुचने में उसी विश्वास की शक्ति का मजबूत हाथ अपने मस्तक पर महसूस कर रहा था । तुम शक्ति का आधार बनकर चाचा को भरोसा दिला सकती हो तो मैं क्यूँ नहीं उस भूली हुयी मस्ती को तुम्हारे माध्यम से पा सकता। तुम्हारे संरक्षण में शक्ति पलती है। भाई तुम्हे क्या सहारा देगा तुम तो पोषण करने वाले को भी शक्ति का अहसास करा रही हो। मेरा भैया दूज अविस्मरनीय है।

1 comment:

Ankit said...

नमस्कार अवधेश जी,
आपको होली और भैय्या दूज दोनों पर्वो की शुभकामनायें
बहुत धारा प्रवाह लिखा है, आपने अपने परिवार की जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है.
ईश्वर सदैव आपके साथ रहे.