मृत्यु प्रसंग
आज हमारे ऑफिस में एक सहयोगी ( चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी) की अचानक मृत्यु हो गयी.मैं जब ऑफिस पहुँचा रोज़ से थोड़ा अलग रोटीन HOने की वज़ह की चर्चा बड़े फक्र से करने लगा। चर्चा ये की आज से कानपुर में ट्रेन्स की आटोमेटिक सिग्नल व्यवस्था की जानी प्रारम्भ कर दी गयी है जिसके कारण काफ़ी गाडियाँ रद्द कर दी गयीं .मुझे डर था की चित्रकूट एक्सप्रेस और मेमो भी इस युद्धस्तरीय कार्य के कारण प्रभावित होंगी अतःइसी आशंका में मैं अपने एक मित्र जो सोमवार की सुबह अपनी कार से लखनऊ जाते हैं , उनके साथ ही आगया चूंकि मैं आज रोतीं से हट कर ट्रेन से हट कर कार से आया था तो इसकी चर्चा भी लाजमी थी । लेकिन तभी बीच में ही बात काटते हुए एक साथी ने बोला - आज आप बेकार आए , आपका आना बेकार हुआ ! मैंने पूछा क्यूँ ? तो उसने कहा - आज एक सहयोगी मर गया इसलिए अभी कन्दोलेंस हो जायेगी .और ऑफिस बंद ! बस ! यहीं से इस मृत्यु प्रसंग पर मैं अभी तक विचार कर रहा हूँ ...मेरी नज़र में प्रसंग कुछ विडम्बना कुछ हमारी संवेदनहीनता कुछ घिसी-पिटी मान्यताओं के कारण वीभत्स सा हो गया है। किंतु मैं इसे कितनी देर अपने में समेटे बैठा रहता इसलिए यहाँ व्यक्त कर अपना तनाव प्रवाहित कर रहा हूँ। मेरे प्रिय कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कुछ पंक्तिया मेरे सर पर उस काव्यमय कथ्य में वर्णित तथ्य से आज की इस घटना को जोड़ने का निरर्थक प्रयास कर रही हैं -" घनी रात बादल रिम-झिम है , दिशा मूक ,निःशब्द वनांतर : व्यापक अन्धकार में सिकुडी सोयी नर की बस्ती भयकर ;जीवन लीला को समाप्त कर ,मरण सेज पर है कोई नर ; बहुत संकुचित छोटा घर है , दीपालोकित फ़िर भी धुंधला; वधु -मूर्छिता,पिता अर्ध-मृत ,दुखिया-माता -स्पंदनहीना; घनी रात बादल रिम-झिम है, दिशा मूक कवि का मन गीला ;यह सब क्षणिक , क्षणिक जीवन है , मानव जीवन क्षण भंगुर;" हम सब आज कितने खुश हैं आज श्री शंकर बाजपेयी के अचानक निधन से सोमवार का भी अवकाश हो गया । शोक संवेदना में अभी एक घंटा लग जाएगा निकलते नकलते १२ बज जाएगा ..एक साथी पूछ रहा है -" डेथ की ख़बर स्थापना चली गयी की नहीं?
मुझे आज और अभी टी वी टॉक के लिए दूर दर्शन केन्द्र प्रबंध निदेशक महोदय को ले जाना है , तुंरत उनसे बात कर आज की रिकॉर्डिंग की याद दिलाना है । अपने काम की ज़ल्दी में मैं शंकर की अभी थोड़ी देर पहले हुई मृत्यु पर बिल्कुल उदासीन अपने काम में तल्लीन हूँ। बाकी लोग इस बेचैनी में की ज़ल्दी छुट्टी हो । प्रबंध निदेशक के कमरे में हमारे संगठन के महामंत्री कुछ चर्चा कर रहे थे , मैं समझा की शोक संवेदना के लिए कर्मचारी को दिए जाने वाले तात्कालिक धन आदि के बारे में बात करने आए होंगे लेकिन पास जाकर देखा तो वह भी एक मेनेजर के ट्रान्सफर की सिफारिश कर रहे थे यानि शंकर की याद इन कर्मचारी नेता जी को भी !नहीं !प्रबंध निदेशक से चलने के लिए कहता हूँ वो तुंरत उठ कर चल देते हैं । शंकर एक अदना सा चपरासी उसके मरने पर अवकाश तो हो सकता है लेकिन संवेदना के दो शब्द किसी के पास नहीं हैं । मैं ख़ुद से पूछ रहा हूँ - तुम क्या कर रहे हो? सिक्यूरिटी गार्ड पूछता है क्या साब जिसकी डेथ हुयी है उसके घर जा रहे हो ? मैं न में सर हिलाता हूँ और विजय रावत की मोटर साइकिल पर बैठ जाता हूँ की कहीं दुबारा कुछ और न पूछ बैठे शंकर की मृत्यु के बारे में ॥ बैंक में मरघट सा सन्नाटा है ..सब लोग हंसते खिल खिलाते अपने - अपने घर जा चुके थे एक-दो लोग जो रुके थे वे दुखी थे इस बात से की प्रबंध निदेशक ने उन्हें बेकार रोक लिया काश! वो भी जा सकते! कोई दुखी नहीं है सिवा मुक्ति बोध की कविता के वे पात्र - वधु-मूर्छिता,पिता-अर्ध-मृत ,दुखिया माता,....पता नहीं कौन कौन होगा घर में। छुट्टी क्यों हुई? शायद पूर्व परम्परा के कारण ..बहुत पहले तो अगर किसी शाखा का कर्मचारी दूसरे जिले में मरजाता था तो बैंक का हेड ऑफिस पूरा बंद हो जाता था .बाद में इस प्रथा को समाप्त किया गया ..संवेदना हीन मशीनीकृत मनुष्य को किसी की मृत्यु विचलित नहीं करती वरन ये तो छुट्टी मनाने का एक अवसर बनकर आता है इसलिए मुक्तिबोध कहते हैं की "इस वीभत्स प्रसंग में रहते तुम अत्यन्त स्वतंत्र -निराकुल " शंकर तुम्हे हमारी अव्यक्त श्रृद्धांजलि !आज देखा मैंने ख़ुद की स्वार्थ लिप्तता जिसे एकाकी भवन तुम्हारे न होने पर वातावरण में प्रवाहित कर रहा था लेकिन महसूस केवल बैंक का पुराना भवन खंड जिसमें तुम अब नही हो तुम्हारी याद में निःशब्द था व्यथित था बस कोई और नही था उस व्यथा का साथी ..मैंने भी उस क्षण किनारा कर लिया जब उसे लगा की ये शायद शंकर को जानता होगा ये उस जगह ज़रूर आएगा जहाँ शंकर की याद में व्यथा क्रंदन कर रही थी आदमी का उससे कोई वास्ता न था । ये कहकर " शंकर शराबी था" सबने अपनी भाव श्रृद्धांजलि देदी थी । क्या कहूँ इस मृत्यु प्रसंग पर!
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